ब्लॉग

नंबी नारायण: भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के अनसुने नायक

नंबी नारायण, भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के एक पूर्व वैज्ञानिक, जिन्होंने भारतीय रॉकेटरी को नई ऊंचाइयों पर पहुचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वे न केवल एक कुशल इंजीनियर हैं, बल्कि एक ऐसी कहानी के प्रतीक भी हैं जो अन्याय, संघर्ष और अंततः न्याय की जीत को दर्शाती है. 1994 के इसरो जासूसी कांड में झूठे आरोपों का शिकार होने के बावजूद, नारायण ने कभी हार नहीं मानी. उनकी जीवन यात्रा प्रेरणादायक है, जो बताती है कि कैसे एक व्यक्ति की दृढ़ता पूरे राष्ट्र को प्रभावित कर सकती है.

ISRO में करियर: अंतरिक्ष यात्रा के स्तंभ

नंबी नारायण का जन्म 12 दिसंबर 1941 को त्रावणकोर राज्य (वर्तमान में तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले) के नागरकोइल में हुआ था. नारायण का करियर 1966 में थुम्बा इक्वेटोरियल रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन (टीईआरएलएस) में टेक्निकल असिस्टेंट के रूप में शुरू हुआ, जो इसरो का हिस्सा था. प्रिंसटन से लौटने के बाद, जब भारतीय रॉकेटरी मुख्य रूप से सॉलिड प्रोपेलेंट पर निर्भर थी, नारायण ने विक्रम साराभाई को लिक्विड प्रोपल्शन तकनीक के बारे में शिक्षित किया. 1974 से 1980 तक, उन्होंने फ्रांस के वर्नोन में 100 भारतीय वैज्ञानिकों की एक टीम का नेतृत्व किया, जहां उन्होंने सोसाइटी यूरोपियन डी प्रोपल्शन (एसईपी) के साथ 60-टन थ्रस्ट वाले वाइकिंग-3 इंजन को सह-विकसित किया.

भारत लौटने पर इस टीम ने इसे पीएसएलवी रॉकेट के लिए एक पूर्ण स्टेज में बदल दिया और इसका नाम ‘विकास’ रखा (जो विक्रम ए. साराभाई का एनाग्राम है).

विकास इंजन, जो फ्रांसीसी इंजीनियरों के सहयोग से विकसित हुआ, आज पीएसएलवी और जीएसएलवी रॉकेटों को शक्ति प्रदान करता है. इसकी वजह से भारत की रॉकेट लॉन्चिंग की सफलता दर और विश्वसनीयता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई. नारायण इसरो के क्रायोजेनिक्स डिवीजन के वरिष्ठ अधिकारी भी रहे. वे 2001 में सेवानिवृत्त हुए, लेकिन जासूसी कांड के बाद उन्हें थिरुवनंतपुरम में डेस्क जॉब्स पर स्थानांतरित कर दिया गया था.

1994 का इसरो जासूसी कांड: एक दर्दनाक अध्याय

नारायण का जीवन 30 नवंबर 1994 को हमेशा के लिए बदल गया, जब केरल पुलिस और इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारियों ने उन्हें जासूसी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. आरोप था कि उन्होंने और उनके सहकर्मी ने मालदीवियन महिलाओं मरियम रशीदा और फौजिया हसन (जिन्हें जासूस माना गया) को रॉकेट इंजन के डिजाइन भेजने के लिए पैसे लिए. वीडियोग्राफ्ड बयानों के आधार पर यह मामला दर्ज किया गया. नारायण को 50 दिनों तक जेल में रखा गया, जहाँ उन्होंने आईबी अधिकारियों द्वारा यातनाओं का आरोप लगाया. उन्होंने दावा किया कि उन्हें इसरो के शीर्ष अधिकारियों जैसे ए.ई. मुथुनायगम को फंसाने के लिए दबाव डाला गया.

मामला दिसंबर 1994 में सीबीआई को सौंप दिया गया. मीडिया और विपक्षी दलों ने इसे राजनीतिक प्रभाव (पी.वी. नरसिम्हा राव और के. करुणाकरण से जुड़ा) का शिकार बताया. सीबीआई के निदेशक ने माफी मांगी, क्योंकि डिजाइन गोपनीय नहीं थे. अप्रैल 1996 में सीबीआई ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की, जिसमें कोई जासूसी न पाए जाने और बयानों को जबरन लिया गया बताया. हालांकि, केरल सरकार ने सीबीआई की अनुमति रद्द कर दी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 1998 में इसे रोका और प्रत्येक आरोपी को 1 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया. सितंबर 1999 में एनएचआरसी ने केरल सरकार की आलोचना की, जो नारायण के करियर को नुकसान पहुंचाने और यातनाओं के लिए जिम्मेदार थी. सुप्रीम कोर्ट ने सभी आरोप खारिज कर दिए और केरल को आगे जांच की अनुमति नहीं दी.

एक मामले ने हिला दी पूरी व्यवस्था

अप्रैल 1996 में सीबीआई ने मामला बंद कर दिया, जिसमें आरोपों को आधारहीन पाया गया. सुप्रीम कोर्ट ने सभी आरोप खारिज कर दिए. 2001 में एनएचआरसी ने केरल सरकार को 1 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया. सितंबर 2012 में केरल हाईकोर्ट ने एनएचआरसी की अपील पर 10 लाख रुपये का मुआवजा तय किया. 14 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने मानसिक क्रूरता के लिए 50 लाख रुपये का मुआवजा दिया और गिरफ्तारी व यातनाओं की जांच के लिए एक पैनल नियुक्त किया. 2021 में केरल सरकार ने 1.3 करोड़ रुपये का समझौता किया. उसी साल 14 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की साजिश में भूमिका की सीबीआई जांच का आदेश दिया.

पुरस्कार और सम्मान

नारायण को उनके योगदान के लिए 2019 में भारत का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ प्रदान किया गया. सितंबर 2018 में राजीव चंद्रशेखर ने उनका नाम पद्म पुरस्कारों के लिए नामित किया था.

आत्मकथा और फिल्म

2017 में नारायण ने अपनी आत्मकथा ऑर्माकलुदे भ्रमणपदम प्रकाशित की. 2018 में रेडी टू फायर: हाउ इंडिया एंड आई सर्वाइव्ड द इसरो स्पाई केस नामक पुस्तक आई. जुलाई 2022 में आर. माधवन द्वारा लिखित, निर्देशित और अभिनीत बायोपिक फिल्म रॉकेट्री: द नंबी इफेक्ट रिलीज हुई, जो 69वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का सम्मान जीती. आज भी वे इसरो की विरासत और भविष्य के मिशनों पर चर्चा करते रहते हैं.

नंबी नारायण की कहानी न केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों की है, बल्कि न्याय व्यवस्था की कमजोरियों और व्यक्तिगत साहस की भी. वे भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के ‘ओपेनहाइमर’ के रूप में जाने जाते हैं, जिन्होंने कठिनाइयों के बावजूद राष्ट्र निर्माण में योगदान दिया. उनकी प्रेरणा से नई पीढ़ी वैज्ञानिक बनने के लिए प्रोत्साहित हो रही है.

ये भी पढ़ें- संसद आतंकी हमले की 24वीं बरसी पर पीएम मोदी समेत शीर्ष नेताओं ने शहीदों को दी श्रद्धांजलि

Also Follow Bharat Express on Youtube

-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

Recent Posts

आसमान में तैनात होगा भारत का स्वदेशी ‘जासूस’, DRDO ने HAPS एयरशिप का किया कामयाब ट्रायल

DRDO ने 21 किमी की ऊंचाई पर 'हाई एल्टीट्यूड प्लेटफॉर्म सिस्टम' (HAPS) का सफल परीक्षण…

6 minutes ago

पूर्व ऑस्ट्रेलियाई पीएम केविन रुड बोले- वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति मजबूत, पीएम मोदी के हुए मुरीद

ऑस्ट्रेलिया के पूर्व पीएम केविन रुड ने कहा कि डोनाल्ड ट्रंप के मन में पीएम…

48 minutes ago

योगी सरकार का सोलर कमाल: 2,942 मेगावाट पहुंची रूफटॉप क्षमता, ‘PM सूर्य घर योजना’ में उत्तर प्रदेश नंबर-1

उत्तर प्रदेश में 'प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना' से 2,942 मेगावाट क्षमता के रूफटॉप सोलर लग…

56 minutes ago

SIR और चुनाव आयोग के खिलाफ INDIA ब्लॉक का हल्लाबोल, पुलिस ने राहुल गांधी को हिरासत में लिया

चुनाव आयोग के काम करने के तरीके और वोटर लिस्ट के स्पेशल गहन रिवीजन यानी…

1 hour ago

‘पाकिस्तानी हों या बांग्लादेशी, बख्शे नहीं जाएंगे’ अमित शाह की नीति का असर, घाटी से 150 अवैध विदेशी बाहर

गृह मंत्री अमित शाह की 'जीरो टॉलरेंस' नीति के तहत जम्मू-कश्मीर से 150 अवैध बांग्लादेशी…

2 hours ago