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रुक्माबाई राउत: 19वीं सदी की क्रांतिकारी नारी, जो बनी स्वतंत्रता की प्रतीक

19वीं सदी का भारत, जहां परंपराओं की जंजीरें महिलाओं को बांधे रखती थीं, वहां एक ऐसी आवाज गूंजी जो आज भी प्रेरणा देती है. रुक्माबाई राउत—भारत की उन दुर्लभ महिलाओं में से एक, जिन्होंने बाल विवाह की अमानवीय प्रथा के खिलाफ न केवल आवाज उठाई, बल्कि अदालत के कठघरे में खड़ी होकर इतिहास रच दिया. 1864 में जन्मीं रुक्माबाई ने न केवल अपनी आजादी का दावा किया, बल्कि पूरे भारतीय समाज को सहमति और महिला अधिकारों की भाषा सिखाई. उनका जीवन एक संघर्ष की गाथा है जो बाल दुल्हन से शुरू होकर चिकित्सक, लेखिका और सुधारक के रूप में समाप्त हुआ.

परंपरा की कैद में जन्म

रुक्माबाई का जन्म 22 नवंबर 1864 को बॉम्बे (अब मुंबई) में एक विद्वान ब्राह्मण परिवार में हुआ. उनके पिता जनार्दन पंत एक प्रसिद्ध विद्वान थे, जबकि मां जयंतीबाई एक विधवा थीं, जिन्होंने दूसरी शादी की थी. उस दौर में बाल विवाह सामाजिक स्वीकृति का प्रतीक था. मात्र 11 वर्ष की अल्पायु में रुक्माबाई का विवाह 19 वर्षीय दादाजीभाई नानाभाई से हो गया. यह शादी मात्र रस्म थी—बिना उनकी सहमति के. विवाह के बाद वे अपनी सास के घर चली गईं, लेकिन शिक्षा और स्वतंत्रता की ललक ने उन्हें कभी शांत नहीं रहने दिया.

रुक्माबाई ने घर पर ही शिक्षा प्राप्त की. उनके सौतेले पिता, जो एक प्रगतिशील व्यक्ति थे, ने उन्हें अंग्रेजी, संस्कृत और अन्य विषयों की शिक्षा दी. लेकिन विवाह की बेड़ियां जल्द ही कसने लगीं. जब रुक्माबाई 19 वर्ष की हुईं, तो उनके पति ने सहवास की मांग की. उन्होंने स्पष्ट इनकार कर दिया. कहा कि वे बाल विवाह की शिकार हैं और बिना सहमति के ऐसा नहीं कर सकतीं. यह इनकार समाज के लिए विद्रोह था.

अदालती जंग: स्वतंत्रता का पहला कदम

1884 में दादाजीभाई ने बॉम्बे हाईकोर्ट में मुकदमा दायर किया, जिसमें उन्होंने रुक्माबाई को सहवास के लिए बाध्य करने या जुर्माना/जेल की सजा की मांग की. यह केस—रुक्माबाई बनाम दादाजी—भारतीय इतिहास का पहला ऐसा मामला था, जहां एक महिला ने बाल विवाह और जबरन सहवास के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी. रुक्माबाई ने अदालत में कहा, “मैं जेल जाने को तैयार हूं, लेकिन उस व्यक्ति के साथ नहीं रहूंगी जिसे मैंने कभी नहीं चुना.”

मुकदमे ने पूरे देश को हिला दिया. प्रगतिशील नेता जैसे बाल गंगाधर तिलक ने उनका समर्थन किया, जबकि रूढ़िवादी समाज ने उन्हें निंदा का शिकार बनाया. 1887 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि रुक्माबाई या तो सहवास करें या 2000 रुपये का जुर्माना दें. लेकिन रुक्माबाई ने झुकना स्वीकार नहीं किया. उन्होंने जेल जाने का फैसला किया.

यह खबर ब्रिटिश संसद तक पहुंची. क्वीन विक्टोरिया ने हस्तक्षेप किया और कहा कि भारत में ऐसी क्रूर प्रथा को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. परिणामस्वरूप, दादाजीभाई ने तलाक स्वीकार कर लिया. रुक्माबाई भारत की पहली हिंदू महिला बनीं, जिन्हें कानूनी तलाक मिला. इस केस का प्रभाव गहरा पड़ा. इसने Age of Consent Act 1891 का मार्ग प्रशस्त किया, जिसके तहत लड़कियों की सहमति की आयु 10 से बढ़ाकर 12 वर्ष की गई. बाद में, बाल विवाह निषेध अधिनियम (1929) की नींव भी इसी संघर्ष से पड़ी.

नारी सशक्तिकरण का प्रतीक

तलाक के बाद रुक्माबाई ने अपनी शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया. 1889 में वे लंदन चली गईं और लंदन स्कूल ऑफ मेडिसिन फॉर वुमन में दाखिला लिया. वहां उन्होंने एमबीएंडबीएस की डिग्री हासिल की—1894 में वे भारत लौटीं तो पश्चिमी चिकित्सा पद्धति की शुरुआती महिला डॉक्टरों में शामिल हो गईं. भारत में महिलाओं के लिए चिकित्सा शिक्षा का द्वार खोलने वाली वे दूसरी भारतीय महिला थीं.

भारत लौटने पर रुक्माबाई ने सूरत और राजकोट के महिला अस्पतालों में चीफ मेडिकल ऑफिसर के रूप में सेवा की. उन्होंने हर जाति-वर्ग की महिलाओं का इलाज किया, बिना भेदभाव के. उनका चिकित्सा कार्य न केवल स्वास्थ्य सेवा था, बल्कि महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का माध्यम भी. सेवानिवृत्ति के बाद भी वे महिलाओं के अधिकारों के लिए सक्रिय रहीं. उन्होंने ‘पर्दा: उन्मूलन की आवश्यकता’ नामक एक पुस्तिका लिखी, जिसमें पर्दा प्रथा की निंदा की.

आवाज जो समाज को झकझोर गया

रुक्माबाई एक कुशल लेखिका भी थीं. उन्होंने ‘ए हिंदू लेडी’ के नाम से द टाइम्स ऑफ इंडिया में लेख लिखे, जिनमें बाल विवाह, विधवा प्रथा और महिलाओं की दयनीय स्थिति पर तीखा प्रहार किया. उनके लेखों ने राष्ट्रीय बहस छेड़ दी और सुधारकों को प्रेरित किया. उनकी कलम ने नारी मुक्ति आंदोलन को मजबूत आधार दिया.

रुक्माबाई राउत का निधन 1955 में हुआ, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है. वे न केवल एक डॉक्टर या तलाकशुदा महिला थीं, बल्कि भारतीय नारीवादी आंदोलन की प्रणेता थीं. उनके साहस ने साबित किया कि परिवर्तन संभव है—चाहे समाज कितना भी दबाव डाले. आज, जब हम MeToo और महिला अधिकारों की बात करते हैं तो रुक्माबाई की कहानी हमें याद दिलाती है कि यह संघर्ष नया नहीं है. वे एक प्रतीक हैं—आजादी, सहमति और समानता की.

रुक्माबाई की कहानी हमें सिखाती है: झुकना कमजोरी नहीं, बल्कि विद्रोह शक्ति है. उनकी जिंदगी भारतीय महिलाओं के लिए एक मशाल है, जो अंधेरे को रोशन करती रहेगी.

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-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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