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छात्रों ने विकसित किया भारत का पहला माइक्रोबायोलॉजिकल नैनो सैटेलाइट RVSAT-1, अंतरिक्ष यात्रियों को स्वस्थ रखने के खोजेगा उपाय

भारत के पहले माइक्रोबायोलॉजिकल नैनो सैटेलाइट RVSAT-1 को पिछले साल 30 दिसंबर को इसरो के PSLV C-60 रॉकेट के जरिए लॉन्च किया गया था. इसे बेंगलुरु के RV कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के छात्रों ने डिजाइन और विकसित किया है. इस सैटेलाइट का मकसद अंतरिक्ष में आंतों के बैक्टीरिया के विकास का अध्ययन करना है.

RV कॉलेज के छात्र समूह ‘टीम अंतरिक्ष’ के लिए यह केवल एक छात्र परियोजना नहीं थी, बल्कि भविष्य की अंतरिक्ष खोज की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था. हर परीक्षण चरण में मिली सफलता से छात्रों का आत्मविश्वास बढ़ा. आखिरकार, 30 दिसंबर को RVSAT-1 के लॉन्च के साथ उनका सपना सच हो गया.

क्या होंगे इसके फायदे?

आंतों के बैक्टीरिया पाचन, इम्यून सिस्टम और स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. अंतरिक्ष में इन बैक्टीरिया के व्यवहार को समझना इसरो को भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को स्वस्थ रखने के उपाय खोजने में मदद करेगा.

RVSAT-1 प्रोजेक्ट से जुड़े एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के तीसरे वर्ष के छात्र एच. नंदीश ने बताया, “मिशन केवल तीन दिनों का था, लेकिन इस दौरान बड़ी मात्रा में डेटा एकत्र किया गया. इसका उद्देश्य शून्य गुरुत्वाकर्षण में “Bacteroides thetaiotaomicron” बैक्टीरिया के विकास को मापना था. इस डेटा से अंतरिक्ष चिकित्सा, अपशिष्ट पुनर्चक्रण प्रणाली और एंटीबायोटिक प्रतिरोध से निपटने के लिए नए समाधान खोजे जा सकते हैं. इसरो और अन्य संस्थानों के उपयोग के लिए शोध पत्र प्रकाशित किया जाएगा.”


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परियोजना प्रबंधक अदिति अरुण के अनुसार बैक्टीरिया की ग्रोथ कर्व ऑप्टिकल डेंसिटी माप के आधार पर तैयार की जाती है. यह अंतरिक्ष में बैक्टीरिया के विकास पैटर्न को समझने में मदद करता है.

इस मिशन में परंपरागत लैब उपकरणों को एक 2-U नैनो सैटेलाइट में मिनिएचराइज करना सबसे बड़ी चुनौती थी. इसके लिए माइक्रोफ्लूडिक सेटअप और एक उन्नत ऑप्टिकल सिस्टम का उपयोग किया गया. सैटेलाइट को थर्मल वैक्यूम (T-VAC), वाइब्रेशन, 1,500g शॉक टेस्ट और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंटेर्फेरेंस जैसी कठोर परिस्थितियों से गुजरना पड़ा.

-भारत एक्सप्रेस

Bharat Express Desk

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