G-7 Summit History: इटली के अपुलिया शहर में सजे वैश्विक मंच पर जब पीएम मोदी दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्तियों के राष्ट्रप्रमुखों से हाथ मिलाएंगे, तो पूरी दुनिया की नजरें इस महाजुटान पर टिकी होंगी. भारत भले ही आधिकारिक रूप से जी-7 (G-7) का स्थायी सदस्य नहीं है, लेकिन वैश्विक राजनीति और मजबूत अर्थव्यवस्था के दम पर पीएम मोदी लगातार इस समिट में ‘विशेष आमंत्रित सदस्य’ के तौर पर शामिल हो रहे हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया की किस्मत तय करने वाले इस सबसे ताकतवर और रसूखदार ग्रुप का इतिहास कितना दिलचस्प और उतार-चढ़ाव भरा रहा है?
आज जिसे हम दुनिया के सात सबसे अमीर और विकसित लोकतांत्रिक देशों का समूह कहते हैं, वह हमेशा से ऐसा नहीं था. कभी यह सिर्फ 6 देशों की एक अनौपचारिक बैठक थी, तो कभी इसमें रूस की एंट्री ने इसे जी-8 बना दिया था. आइए डिकोड करते हैं कई बदलावों से गुजरते हुए संगठन को जो आज मजबूत धमक दिखा रहा है.
इस संगठन की बुनियाद 1970 के दशक में आए वैश्विक आर्थिक संकट और तेल संकट (Oil Crisis) के दौरान पड़ी थी. साल 1975 में फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति के निमंत्रण पर दुनिया की 6 सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्तियां फ्रांस, पश्चिम जर्मनी, इटली, जापान, यूनाइटेड किंगडम (UK) और संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) एक मंच पर आए. इसे तब ‘ग्रुप ऑफ सिक्स’ यानी G-6 कहा गया. इसका मकसद वैश्विक आर्थिक मंदी से निपटने के लिए अनौपचारिक रूप से विचारों का आदान-प्रदान करना था.
G-6 के गठन के ठीक एक साल बाद, यानी 1976 में उत्तरी अमेरिकी महाद्वीप की एक और बड़ी आर्थिक ताकत ‘कनाडा’ को भी इस विशिष्ट क्लब में शामिल कर लिया गया. कनाडा के जुड़ने के साथ ही इस संगठन का नाम बदलकर G-7 (Group of Seven) हो गया. इसके बाद से यह समूह हर साल वैश्विक अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और व्यापार जैसे गंभीर मुद्दों पर चर्चा के लिए सालाना शिखर सम्मेलन (Summit) आयोजित करने लगा.
90 के दशक में सोवियत संघ (USSR) के विघटन और शीत युद्ध (Cold War) की समाप्ति के बाद वैश्विक भू-राजनीति तेजी से बदली. पश्चिमी देश रूस को अपने पाले में लाना चाहते थे. इसी रणनीतिक कूटनीति के तहत साल 1997-1998 में रूस को इस समूह का स्थायी सदस्य बना लिया गया. रूस के शामिल होने के बाद यह मंच G-8 के रूप में जाना जाने लगा, जिसने करीब डेढ़ दशक तक दुनिया के बड़े फैसलों को प्रभावित किया.
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रूस और पश्चिमी देशों की यह दोस्ती ज्यादा लंबी नहीं चल सकी. साल 2014 में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन के हिस्से ‘क्रीमिया’ पर सैन्य चढ़ाई कर उस पर अवैध कब्जा कर लिया. रूस के इस आक्रामक कदम से जी-7 के बाकी सात देश (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, कनाडा, जापान) भड़क गए. अंतरराष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए रूस की सदस्यता को सस्पेंड कर दिया गया और वह इस ग्रुप से बाहर हो गया. नतीजा यह हुआ कि यह संगठन एक बार फिर अपने पुराने स्वरूप G-7 में लौट आया.
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