Bihar News: एक वक्त था जब बिहार में चुनाव सिर्फ वोट डालने का मौका नहीं होता था बल्कि पूरे राज्य के लिए एक उत्सव जैसा माहौल होता था. गांव-गांव में ढोल बजते थे, लोकगीत गूंजते थे और चुनावी प्रचार में होली-दीवाली जैसा रंग होता था. लेकिन अब 2025 के चुनाव में सब कुछ बदल गया है.
1995 में जब लेखक कैलिफोर्निया से बिहार चुनाव का सर्वे करने आया था, तब यहां की फिजा में चुनावी जोश था. रिक्शों पर बंधे लाउडस्पीकर, लोक गायकों की टोलियां, और हर पार्टी के अपने गीत होते थे. गांवों में शाम होते ही चौपाल सजती थी, लोग नारे लगाते थे, गाने गाते थे, और राजनीति में दिल से भाग लेते थे.
तब चुनाव प्रचार में रतजगी होती थी. खेतों से लौटने के बाद लोग दीया-बाती करके चौक पर जमा होते थे. वहां भोजपुर के ढोल और मिथिला के गीतों के बीच मर्द, औरतें और बच्चे भी झूमते थे. लालू यादव के दौर में तो नारे भी मजेदार होते थे. जैसे “लालू के लालटेन फसल कादो में.” यह नारा कीचड़ भरी सड़कों और विकास की कमी पर कटाक्ष था.
विदेशी पत्रकारों को यह सब देखकर हैरानी होती थी. वे कहते थे कि भारत में चुनाव जितना लोकतांत्रिक है उतना ही धार्मिक उत्सव जैसा भी है. और सच में, बिहार में चुनावी माहौल होली और दीवाली से कम नहीं होता था. चाय की दुकानों पर बहसें होती थीं, प्रचार के दौरान गुलाल उड़ता था और लिट्टी-चोखा से लेकर खीर-मिठाई तक की दावतें होती थीं.
लेकिन अब, 2025 में बिहार का चुनाव प्रचार एकदम बदल गया है. न लोकगीत हैं, न लाउडस्पीकर. नारे अब दीवारों पर नहीं बल्कि सोशल मीडिया पर दिखते हैं. प्रचार reels और इंस्टाग्राम स्टोरीज में सिमट गया है. गांवों की गलियों में अब न धूल उड़ती है और न कोई हुजूम दिखता है. यहां तक कि मैथिली ठाकुर जैसी लोकप्रिय गायिका को टिकट मिलने के बावजूद भी उनके गीतों की गूंज नहीं सुनाई देती.
अब प्रचार वर्चुअल हो गया है. रिंग लाइट के सामने बैठकर उम्मीदवार लाइव आते हैं, और लाइक्स गिनते हैं. प्रशांत किशोर का जनसुराज अभियान ज़मीन पर जरूर दिखता है, लेकिन बाकी सब डिजिटल हो गया है. न जोश है, न उम्मीदों की गूंज. लोकतंत्र अब स्क्रीन पर स्क्रॉल हो रहा है.
इस बदलाव की वजहें कई हैं. दिवाली और छठ जैसे त्योहारों की खुमारी, चुनाव आयोग की सख्त समयसीमा और राजनीतिक दलों की आपसी खींचतान ने प्रचार को धीमा कर दिया है. सितंबर-अक्टूबर गठबंधन की जोड़तोड़ में निकल गया और नवंबर में मतदान की तारीखें आ गईं. राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की यात्राओं ने थोड़ी हलचल जरूर की थी लेकिन चुनावी तारीखों के बाद से माहौल फिर से शांत हो गया.
अब सवाल उठता है कि क्या यह खामोशी मतदान पर असर डालेगी? इतिहास कहता है कि कम प्रचार और कम उत्साह अक्सर सत्ता में बैठे लोगों के पक्ष में जाता है. कम मतदान का मतलब है कम बदलाव. लेकिन शायद मतदाता अब शोर से ऊब चुके हैं. हो सकता है वे शांति से सोचकर वोट देना चाहते हों.
फिर भी, इस शांत माहौल में लोकतंत्र की आत्मा कहीं खोती सी लगती है. वो गाने, वो नारे, वो बहसें जो कभी लोकतंत्र को जीवंत बनाते थे अब गायब हैं. अब चुनाव एक भागीदारी नहीं बल्कि एक दूर से देखने वाली प्रक्रिया बनती जा रही है.
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बिहार का चुनाव प्रचार अब सिर्फ स्टाइल में नहीं सोच में भी बदल गया है. जब राजनीति सिर्फ दिखावे तक सीमित रह जाए तो लोकतंत्र कमजोर होता है. अब देखना ये है कि 2025 की ये शांत शरद ऋतु बिहार को निपुणता की ओर ले जाती है या उदासी की ओर ले जाती है.
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-भारत एक्सप्रेस
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