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कैलाशपति मिश्र: बिहार भाजपा के भीष्म पितामह, जो कभी नरेंद्र मोदी के नैतिक संबल बने थे

Bihar Elections 2025: बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान के बाद राजनीतिक हलचल तेज हो चुकी है. एनडीए और महागठबंधन तमाम समीकरणों को साधने में जुट गए हैं. एनडीए में भाजपा आज सीट शेयरिंग में निर्णायक भूमिका में है. वही भाजपा जो कभी बिहार की राजनीति में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्षरत थी. मौजूदा परिप्रेक्ष्य में जब भाजपा प्रदेश में अपनी भूमिका और सरकार बनाने की स्थिति का दावा करती है, तब यह जानना जरूरी हो जाता है कि पार्टी की नींव किसने डाली थी और इसे मजबूत करने का काम किसने किया था.

जिस भाजपा की राजनीतिक धुरी आज सत्ता के केंद्र तक फैली है, उसकी बुनियाद बिहार में एक ऐसे नेता ने रखी थी, जो आज कहीं न कहीं गुमनाम होता जा रहा है. ये नाम है कैलाशपति मिश्र. एक ऐसा नेता, जिन्होंने पार्टी को उस समय सींचा जब इसके अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह था.

बतौर राज्यपाल मोदी के मार्गदर्शक

कैलाशपति मिश्र न केवल बिहार भाजपा के शिल्पकार थे, बल्कि गुजरात के राज्यपाल रहते हुए नरेंद्र मोदी के कठिन दौर में उन्हें नैतिक संबल देने वाले मार्गदर्शक भी बने.

कैलाशपति मिश्र का जन्म 5 अक्टूबर 1923 को बिहार के बक्सर जिले के दुधारचक गांव में एक साधारण भूमिहार ब्राह्मण परिवार में हुआ. बचपन से ही उनमें देशभक्ति और संगठनप्रियता के संस्कार थे. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेकर वे जेल गए. उस अनुभव ने उनके भीतर राष्ट्रसेवा की ज्वाला और प्रखर कर दी.

साल 1945 में मिश्र का संपर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (संघ) से हुआ. इसके बाद उन्होंने अविवाहित रहकर संघ और राष्ट्र के लिए समर्पित जीवन जीने का फैसला किया. एक प्रचारक के रूप में उन्होंने आरा, पूर्णिया और पटना में संघ का कार्यभार संभाला. साल 1959 में उन्हें जनसंघ के बिहार में संगठन मंत्री की जिम्मेदारी मिली. यहीं से शुरू होती है बिहार की भाजपा यात्रा.

साइकिल से गांव-गांव

जिस दौर में कांग्रेस का बिहार में जबरदस्त प्रभाव था और लोग संघ और जनसंघ के नाम पर संदेह करते थे, उस दौर में कैलाशपति मिश्र ने साइकिल और रिक्शे के जरिए गांव-गांव से लेकर खेत-खेत तक जाकर लोगों को संगठन के बारे में बताकर उसे मजबूत करने का काम किया. मिश्र के एक बुलावे पर कार्यकर्ता पहुंच जाते थे. मिश्र का मानना था कि पार्टी संस्कार से चलती है, सिर्फ विचार से नहीं.

मिश्र की तपस्या

आज बिहार में भाजपा अगर सरकार में है, तो वह मिश्र की तपस्या का ही परिणाम है. कैलाशपति मिश्र ने ही बिहार में भाजपा की जड़ें मजबूत करने का काम किया था. दिवंगत नेता और प्रदेश के उपमुख्यमंत्री रहे सुशील कुमार मोदी ने कभी कहा था कि जनसंघ से लेकर भाजपा तक की जो नींव बिहार में पड़ी, वह कैलाशपति जी की ईंटों पर टिकी है.

पहले अध्यक्ष

1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी तो वे वित्त मंत्री बने. सत्ता में आने के बाद भी वह पहले वाले कैलाशपति बने रहे. मंत्री रहते हुए भी वे कार्यकर्ताओं के घर भोजन करते थे. पद छोड़ने के वक्त उनके खाते में केवल 1300 रुपए थे. इसके बाद, जब 1980 में भाजपा बनी, तब उन्हें बिहार भाजपा का पहला प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. उनके नेतृत्व में भाजपा ने गांवों तक अपनी जड़ें फैलायीं और कार्यकर्ताओं का विशाल परिवार खड़ा किया.

राजनीति के अजातशत्रु

देश की राजनीति में कैलाशपति मिश्र को अजातशत्रु कहा जाता था. कोई भी उनका व्यक्तिगत विरोधी नहीं था. भाजपा में उन्हें नैतिकता और संयम का प्रतीक माना जाता था. यही कारण था कि 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने उन्हें गुजरात का राज्यपाल नियुक्त किया.

संवैधानिक मर्यादा और नैतिक शक्ति के उदाहरण

2002 के गुजरात दंगों के बाद जब उस वक्त के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर विपक्ष और मीडिया हमलावर थे और पार्टी के भीतर से भी नरेंद्र मोदी के इस्तीफे को लेकर कई आवाजें उठ रही थीं, यह वह समय था जब मोदी राजनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ते जा रहे थे. ऐसे कठिन दौर में राज्यपाल कैलाशपति मिश्र ने न केवल संवैधानिक मर्यादा निभाई, बल्कि नैतिक शक्ति के रूप में मोदी के साथ खड़े रहे.

राजनीति के जानकारों की मानें तो उन्होंने कहा था कि नरेंद्र मोदी को बलि का बकरा बनाना अनुचित है. उन्होंने परिस्थितियों को नियंत्रित करने की पूरी कोशिश की है. उन्हें हटाना न्याय नहीं, राजनीति होगी. उनका यह रुख न केवल भाजपा के भीतर मोदी के पक्ष में माहौल बनाने में निर्णायक साबित हुआ, बल्कि मोदी को नैतिक दृढ़ता भी प्रदान की. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि उस दौर में कैलाशपति मिश्र जैसे वरिष्ठ नेता ने समर्थन न दिया होता, तो मोदी का राजनीतिक सफर शायद वहीं रुक जाता.

कैलाशपति मिश्र का जीवन राजनीति में नैतिकता का जीवंत उदाहरण था. वे सत्ता में रहे, विपक्ष में भी रहे, पर कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया. जीवन में उन पर न कभी भ्रष्टाचार का आरोप लगा, न ही वह किसी विवाद में पड़े. उन्होंने कहा था कि राजनीति अगर त्याग से जुड़ जाए, तो वही राष्ट्रनिर्माण करती है; स्वार्थ से जुड़ जाए, तो विनाश.

बिहार की राजधानी पटना में ही साल 2012 में 3 नवंबर को उनका निधन हुआ. हालांकि, उनकी स्मृति भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच आज भी एक प्रेरणा के रूप में है.

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विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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