RSS strategy Bengal election BJP win: पश्चिम बंगाल में भाजपा की 207 सीटों वाली ऐतिहासिक जीत का सेहरा भले ही राजनीतिक चेहरों के सिर बंधा हो, लेकिन इसकी असली स्क्रिप्ट नागपुर और बंगाल के सुदूर गांवों में संघ के स्वयंसेवकों ने लिखी थी. दरअसल RSS के करीबी सूत्रों से जानकारी मिली है कि बंगाल फतह के लिए संघ ने 1.75 लाख से अधिक छोटी-बड़ी बैठकें कीं और ‘मतदाता जागरूकता’ के नाम पर घर-घर दस्तक दी थी. यह महज एक चुनाव नहीं बल्कि संघ के लिए ‘अस्तित्व की लड़ाई’ थी, जिसे उन्होंने “यह आखिरी ट्रेन है” के नारे के साथ लड़ा.
इस चुनावी जीत के बीच बताते चलें बंगाल में संघ का विस्तार किसी चमत्कार से कम नहीं है. 2011 में जहां राज्य में महज 900 शाखाएं थीं, आज उनकी संख्या 5,000 पार कर गई है. अकेले 2021 के बाद संघ ने अपनी आक्रामक रणनीति के तहत 1,000 नई शाखाएं खोलीं.
वहीं ज्ञात रहे संघ ने बंगाल को तीन सांगठनिक प्रांतों उत्तर, मध्य और दक्षिण में बांटकर माइक्रो-प्लानिंग की. मध्य बंग प्रांत में पिछले 3 साल में 500 नई शाखाएं खुलना यह बताता है कि ‘भद्रलोक’ कहे जाने वाले शिक्षित वर्ग के बीच भी संघ ने अपनी पैठ बना ली है.
जब RSS के स्वयंसेवकों ने बंगाल के मतदाताओं के बीच गए तो उन्होंने संदेश फैलाया कि “यह आखिरी ट्रेन है, अगर यह मौका चूक गए तो आने वाली पीढ़ियां माफ नहीं करेंगी. इसके साथ ही घुसपैठ और सुरक्षा के मुद्दे को सीधे पूर्वोत्तर भारत की अखंडता से जोड़ते हुए इस चुनाव को प्रोजेक्ट किया.
इसके अलावा बंकिमचंद्र चटर्जी की धरती पर ‘वन्दे मातरम्’ के 150वें वर्ष को मुद्दा बनाया गया. इसके फलस्वरूप लोगों के मन में यह बात गहराई से बैठाई गई कि जिस धरती से यह गीत निकला, वहां इसे बोलना ‘अपराध’ बना दिया गया है. वहीं छोटे बड़े सभी मंचों से संघ ने ‘जय श्री राम’ के प्रति ममता बनर्जी की नाराजगी को भी जनता के बीच ‘हिंदू पहचान’ के दमन के रूप में पेश किया गया.
इस चुनाव में संघ ने अपनी रणनीति (Bengal BJP win Factor) का केंद्र उन इलाकों को बनाया जहां टीएमसी मजबूत थी. चाय बागानों और आदिवासी बहुल ‘जंगलमहल’ क्षेत्रों में संघ ने अपनी सामाजिक विश्वसनीयता बढ़ाई. सेवा कार्यों के जरिए आदिवासियों के बीच सुरक्षा की भावना पैदा की गई, जिसका सीधा असर वोट प्रतिशत में दिखा. यह भी ज्ञात रहे इस बार बंगाल में 91% से अधिक रिकॉर्ड मतदान होना संघ के उस ‘डोर-टू-डोर’ संपर्क का नतीजा है, जिसने सुदूर इलाकों के मतदाताओं को पोलिंग बूथ तक खींच लाया.
चुनाव से ठीक पहले संघ ने भाजपा के भीतर की गुटबाजी को खत्म करने के लिए ‘प्रभावी समन्वय बैठकें’ कीं. सीमावर्ती क्षेत्रों में घुसपैठ के मुद्दे पर जागरूकता फैलाकर एक ठोस ‘हिंदू वोट बैंक’ तैयार किया गया. चाय की थड़ियों से लेकर मंदिरों के चबूतरों तक, संघ के लाखों स्वयंसेवकों ने बिना किसी शोर-शराबे के ‘साइलेंट मिशन’ को अंजाम दिया. नतीजा (Bengal BJP win Factor) यह हुआ कि भाजपा ने न केवल ग्रामीण बल्कि शहरी शिक्षित वर्ग (भद्रलोक) के बीच भी सेंध लगा दी, जो कभी भाजपा से दूरी बनाकर रखते थे.
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-भारत एक्सप्रेस
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