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दुर्ग में मानवता की मिसाल; 25 लोगों ने किया देहदान का संकल्प, 19 महिलाओं ने रूढ़ियां तोड़कर रचा इतिहास

Durg News: छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले से एक ऐसी खबर आई है जो न केवल दिल को छू लेती है, बल्कि समाज के प्रति हमारी जिम्मेदारी का अहसास भी कराती है. दुर्ग जिला अस्पताल में हाल ही में मानवता की एक ऐसी मिसाल पेश की गई, जिसने साबित कर दिया कि इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं है. यहां 25 जागरूक नागरिकों ने एक साथ ‘देहदान’ करने का बड़ा फैसला लिया है, ताकि मरने के बाद भी उनका शरीर किसी के काम आ सके.

आधी आबादी ने पेश की पूरी मिसाल

इस पूरे वाकये में सबसे खूबसूरत बात यह रही कि देहदान का संकल्प लेने वालों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से कहीं ज्यादा है. कुल 25 लोगों में से 19 महिलाएं और 6 पुरुष शामिल हैं. अस्पताल के गलियारे में जब इन सभी को सम्मानपूर्वक प्रमाण पत्र दिए गए, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें गर्व से नम थीं. यह देखना वाकई सुखद है कि महिलाएं अब सामाजिक रूढ़ियों को तोड़कर वैज्ञानिक सोच और सेवा की दिशा में बढ़-चढ़कर नेतृत्व कर रही हैं.

क्यों जरूरी है देहदान?

अक्सर लोग सोचते हैं कि देहदान का फायदा क्या है? दरअसल, जब कोई व्यक्ति अपनी देह दान करता है, तो उसका शरीर मेडिकल कॉलेज के छात्रों के लिए एक ‘किताब’ की तरह होता है. भविष्य के डॉक्टर इसी के जरिए मानव शरीर की बारीकियों, अंगों की बनावट और बीमारियों के प्रभाव को करीब से समझते हैं.

नवदृष्टि फाउंडेशन के अध्यक्ष श्री राज आढ़तिया ने कार्यक्रम के दौरान बड़ी पते की बात कही. उन्होंने कहा, “देहदान समाज के लिए दिया गया वह सर्वश्रेष्ठ उपहार है, जिसकी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती. इससे न केवल आने वाली पीढ़ी के डॉक्टर बेहतर ट्रेनिंग पा सकेंगे, बल्कि वे आगे चलकर मरीजों का सटीक इलाज भी कर पाएंगे.”

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डॉक्टरों की अपील

इस भावुक और प्रेरणादायी मौके पर जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. आशीषन मिंज ने भी अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि आज के दौर में समाज को रक्तदान, नेत्रदान और देहदान जैसे पुण्य कार्यों के प्रति और भी जागरूक होने की जरूरत है. उन्होंने लोगों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि ऐसे फैसलों से न केवल मेडिकल छात्रों की पढ़ाई आसान होती है, बल्कि शोध के नए रास्ते भी खुलते हैं.

एक नई सोच की शुरुआत

दुर्ग जिला अस्पताल का यह कार्यक्रम सिर्फ एक औपचारिक आयोजन नहीं था, बल्कि यह समाज की बदलती सोच का आईना था. जहां मौत के बाद शरीर को जलाना या दफनाना एक परंपरा है, वहीं उसे शिक्षा और शोध के लिए समर्पित कर देना एक ‘महान वैज्ञानिक सोच’ है. इन 25 लोगों ने यह दिखा दिया है कि “मरकर भी अमर होने” का असल रास्ता समाज की निस्वार्थ सेवा ही है.

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-भारत एक्सप्रेस

Radha Priya

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