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कैश कांड मामले में जस्टिस यशवंत वर्मा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका, महाभियोग जांच कमेटी की वैधता वाली याचिका खारिज

कैश कांड मामले में कथित आरोपी जस्टिस यशवंत वर्मा को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है. कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा की ओर से दायर उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें लोकसभा स्पीकर द्वारा गठित समिति की वैधता को चुनौती दी थी. जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा की पीठ ने यह फैसला सुनाया है. अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि जस्टिस वर्मा ने राज्यसभा के उपसभापति द्वारा महाभियोग प्रस्ताव खारिज किए जाने के आदेश को चुनौती नही दी है.

मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस वर्मा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने दलील थी कि महाभियोग प्रस्ताव दोनों सदनों में एक ही दिन पेश किया गया था, इसलिए समिति का गठन लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा चेयरमैन द्वारा संयुक्त रूप से किया जाना चाहिए था.

हालही में जस्टिस वर्मा ने संसदीय समिति के समक्ष पेश होकर कहा है कि जिस दिन यह घटना घटी है, उस दिन वह दिल्ली में मौजूद नही थे. उन्होंने अपना पक्ष रखते हुए यह भी कहा कि उनके सरकारी आवास पर तैनात सुरक्षा अधिकारी अपना काम करने में विफल रहे तो इसके लिए उन्हें दोषी नही ठहराया जा सकता.

डिप्टी चेयरमैन के अधिकारों पर सवाल

सुनवाई के दौरान वर्मा की ओर से पेश वकील ने कहा था कि राज्यसभा के चेयरमैन की अनुपस्थिति में डिप्टी चेयरमैन के अधिकार सीमित है, इसपर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर एक उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए जज की नियुक्ति को मंजूरी दे सकते हैं, तो वह नियुक्ति को रद्द भी कर सकती है. जस्टिस वर्मा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कोर्ट को बताया था कि 1991 का जजेज कानून जज को हटाने की प्रक्रिया की योजना में कहीं फिट नही बैठता है. उन्होंने कहा था कि यह कानून सिर्फ सदन के कामकाज को विनियमित करने के लिए हैं. अगर इसे जज को हटाने की प्रक्रिया पर लागू किया गया, तो इससे अव्यवहारिक और हास्यास्पद स्थिति पैदा होगी.

रोहतगी ने कहा था डिप्टी चेयरमैन, जब तक उन्हें किसी आपात स्थिति में अध्यक्ष के आसन संभालने के लिए नहीं बुलाया जाता, तब तक वे सदन के एक सदस्य ही होते है. इसके विपरीत अध्यक्ष पूरी तरह गैर-पक्षपाती होते है. इसलिए यहां हितों का टकराव है. उन्होंने कहा था कि एक जज की भूमिका डिप्टी चेयरमैन नही निभा सकते.

बता दें कि जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव 21 जुलाई को लाया गया था और उसी दिन राज्यसभा के चेयरमैन ने इस्तीफा दे दिया था. जिसके बाद 11 अगस्त को डिप्टी चेयरमैन ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया और 12 अगस्त को लोकसभा अध्यक्ष ने जांच कमेटी बनाने की मंजूरी दे दी थी.

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-भारत एक्सप्रेस

गोपाल कृष्ण

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