बिहार ने तोड़ा 70 साल का रिकॉर्ड
Bihar Election 2025: बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में मतदाताओं के अभूतपूर्व उत्साह आजादी के बाद से सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए. पहले चरण की 121 सीटों पर रिकॉर्ड 64.69% वोटिंग हुई है, जो पिछले विधानसभा चुनाव के पहले चरण की सीटों के मुकाबले करीब साढ़े आठ फीसदी (8.5%) अधिक है. प्रदेश से आए इस सकारात्म रुझान के बाद भी वोटरों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीतिक धड़कनें बढ़ा दी है.
बिहार के चुनावी इतिहास में यह सर्वाधिक वोटिंग है लेकिन, सबसे बड़ी चिंता यह है कि जब-जब बिहार में मतदान में 5 फीसदी से अधिक का इजाफा हुआ है, तब-तब राज्य में सत्ता परिवर्तन हुआ है और सियासी दौर पूरी तरह बदल गया है.
भारत के चुनावी इतिहास में आम तौर पर उच्च मतदान को जनता द्वारा बदलाव की इच्छा के रूप में देखा जाता है. बिहार के विधानसभा चुनाव के इतिहास को देखें तो 1951-52 से लेकर अब तक, जब-जब मतदान में 5% से अधिक का इजाफा हुआ है, उसका सीधा असर सत्ता पर पड़ा है और सरकारें बदल गई हैं. अगर दूसरे चरण की 122 सीटों पर भी इसी तरह वोटिंग पैटर्न दोहराया जाता है, तो यह नीतीश कुमार की एनडीए सरकार के लिए गहरी सियासी टेंशन पैदा कर सकता है.
बिहार के चुनावी इतिहास में वोटिंग प्रतिशत का बदलाव कई बार सत्ता के परिवर्तन का कारण बना है. चार चुनावों से यह स्पष्ट होता है कि वोटिंग प्रतिशत का बदलाव सत्ता के परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण कारक हो सकता है. आइए जानते हैं कि किन चार चुनावों में वोटिंग प्रतिशत में बदलाव ने सत्ता की कुंजी बदली
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1967 के चुनाव में वोटिंग में 7% की बढ़ोतरी हुई थी, जिससे राज्य में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी. महामाया प्रसाद सिन्हा मुख्यमंत्री बने, लेकिन सरकार अस्थिर रही और 1969 में फिर से चुनाव हुए.
1980 में 6.8% ज्यादा मतदान हुआ था, जिससे कांग्रेस अपने दम पर सत्ता में लौटी और जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री बने. हालांकि, कांग्रेस के अंदर की राजनीति के कारण 10 साल में ही कांग्रेस का शासन खत्म हो गया.
1990 में 5.8% ज्यादा मतदान हुआ और कांग्रेस की सत्ता से विदाई हो गई. जनता दल की सरकार बनी और लालू यादव मुख्यमंत्री बने. लालू यादव ने बिहार की पूरी राजनीति को बदल दिया और 15 साल तक राज किया.
2005 में 16.1% कम वोटिंग हुई, लेकिन लालू-राबड़ी शासन का अंत हो गया. नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और सुशासन की छवि बनाई. नीतीश कुमार 20 साल से बिहार की सत्ता पर काबिज हैं.
पहले चरण में मिथिलांचल, कोसी, मुंगेर, सारण और भोजपुर बेल्ट की 121 सीटों पर मतदान हुआ है. अब सियासी दल इस बढ़े हुए वोटिंग पैटर्न का अपने-अपने पक्ष में आकलन कर रहे हैं, लेकिन रिकॉर्ड तोड़ मतदान ने सभी राजनीतिक दलों की धड़कनें बढ़ा दी हैं. इसे के साथ ही सियासी जानकार इस बढ़े मतदान के पीछे के 5 कारणों पर चर्चा कर रहे हैं.
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2025 विधानसभा चुनाव में दोनों गठबंधनों ने महिलाओं को केंद्र में रखकर वादे किए. सरकार ने चुनाव से पहले महिला रोजगार योजना के तहत 1.21 करोड़ महिलाओं के खातों में 10-10 हजार रुपये की पहली किस्त जमा की. वहीं, महागठबंधन की ओर से तेजस्वी यादव ने हर साल 30 हजार रुपये देने का ऐलान किया. इसी प्रोत्साहन से महिलाएं बड़ी संख्या में मतदान केंद्रों पर पहुंचीं.
चुनाव से ठीक पहले बिहार में SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) पूरा हुआ, जिसमें करीब 70 लाख मृत, फर्जी, डुप्लिकेट, गायब या बाहर शिफ्ट हुए वोटरों के नाम लिस्ट से हटाए गए. ये नाम पहले वोटिंग में शामिल नहीं होते थे, इसलिए अब कुल मतदान प्रतिशत ऊंचा दिखाई दे रहा है.
SIR से मतदान बढ़ने के साथ ही महागठबंधन ने वोटर लिस्ट पर सवाल उठाकर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाया. इससे पिछड़ा-अति पिछड़ा वोटर बनाम अगड़ा वोटरों में ध्रुवीकरण हुआ, और दोनों पक्षों के समर्थक बड़ी तादाद में वोट डालने पहुंचे.
प्रशांत किशोर की नई पार्टी जन सुराज ने चुनाव में कदम रखा, जिससे नई राजनीतिक उम्मीद जागी. खासकर युवा और पहली बार के वोटर इससे प्रभावित हुए, और उत्साहपूर्वक मतदान करने आए.
20 अक्टूबर को दिवाली और 28 अक्टूबर को छठ पर्व था. बाहर रहने वाले लाखों वोटर त्योहारों के लिए घर लौटे. 6 नवंबर की मतदान तिथि देखकर वे रुक गए और बंपर वोटिंग में हिस्सा लिया, जिससे प्रतिशत में भारी उछाल आया.
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पहले चरण की 121 सीटों पर 64.69% मतदान हुआ है, जबकि 2020 के पिछले चुनाव में इन्हीं सीटों पर करीब 56% मतदान रहा था. इस साढ़े आठ फीसदी की रिकॉर्ड वृद्धि को सियासी विश्लेषक एंटी-इनकम्बेंसी (सत्ता विरोधी लहर) के संकेत के रूप में देख रहे हैं. खैर इन तमाम कयासों से 14 नवंबर को पर्दा उठ जाएगा.
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