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क्या यही है चंद्रपुर की असली जन्मभूमि? तस्वीरों में देखिए नदियों के किनारे सदियों से सोई एक प्राचीन सभ्यता

अभिषेक/महाराष्ट्र


History of Chandrapur : महाराष्ट्र का चंद्रपुर जिला अमूमन अपने जंगलों, बाघों और गोंड राजाओं के इतिहास के लिए जाना जाता है. वहीं इतिहासकार और रिसर्चर प्रो. सुरेश चोपने की खोज में इराई और जरपत नदियों के संगम के पास ‘बोर रीठ’ नाम का एक ऐसा तबाह हो चुका प्राचीन गांव मिला है, जो पाषाण काल (Stone Age) से लेकर यादव युग तक के मानवीय विकास की अनकही कहानी बयां कर रहा है .

चंद्रपुर में इराई और जरपत नदियों के संगम के पास ‘बोर रीठ’ नामक एक प्राचीन, तबाह हो चुके गांव की खोज हुई है, जो शोधकर्ताओं के अनुसार आधुनिक चंद्रपुर शहर की सबसे पहली और असली बस्ती है. इतिहासकार प्रो. सुरेश चोपने (Prof. Suresh Chopne) के नेतृत्व में हुए इस शोध में यहां 10,000 साल पुराने पाषाण युग (Stone Age) के पत्थर के औजार, 3,000 साल पुरानी कलाकृतियां, और 2,000 वर्ष प्राचीन सातवाहन, वाकाटक व यादव काल के बर्तन, सिक्के, गहने और प्राचीन शिवलिंग मिले हैं. यह स्थान गोंड राजाओं और ब्रिटिश काल से सदियों पहले मानवीय सभ्यता और व्यापार का एक समृद्ध केंद्र था, जिसके नीचे आज भी इतिहास के कई गहरे राज दफन हैं .

गवली गांव या पुरातत्व का खजाना?

आज जिसे स्थानीय लोग ‘बोर रीठ’ कहते हैं और एक आम गवली गांव समझते हैं, वह असल में पुरातत्व का खजाना है. प्रो. सुरेश चोपने के शोध के अनुसार, इस जगह पर आज से 10,000 साल पहले पाषाण युग के इंसानों की बस्ती हुआ करती थी. इतना ही नहीं, यह भूमि सातवाहन, वाकाटक और यादव राजवंशों के दौर में भी फल-फूल रही थी (Stone Age Remains).

यहां खेतों की खुदाई और सर्वे के दौरान 10,000 साल पुराने पत्थर के औजार, 3,000 साल पुरानी कलाकृतियां, और 2,000 वर्ष प्राचीन बर्तनों के टुकड़े मिले हैं. प्राचीन काल के जानवरों के दांत, हड्डियां और लोहा गलाने वाली भट्टियों के अवशेष यह साबित करते हैं कि यहां के लोग तकनीकी रूप से भी समृद्ध थे.

मिट्टी में दफन प्राचीन वैभव और आस्था

इस लुप्त हो चुके गांव का धार्मिक महत्व भी रहा है. यहां एक प्राचीन मंदिर के अवशेष मिले हैं, जिनमें दो शिवलिंग आज भी मौजूद हैं . इसी परिसर में हाल ही में एक नया हनुमान मंदिर भी बनाया गया है. कुछ समय पहले यहां खेती करते वक्त किसानों को प्राचीन सिक्के और कीमती गहने भी मिले थे .

आज भले ही यहां हरी-भरी फसलें लहलहाती हैं, लेकिन मिट्टी के नीचे दबे ढहे हुए मकानों के कारण यह जगह एक छोटी पहाड़ी जैसी नजर आती है. जानकारों का मानना है कि यदि यहां व्यवस्थित रूप से वैज्ञानिक खुदाई (Excavation) की जाए, तो भारतीय इतिहास के कई नए पन्ने खुल सकते हैं  .

चंद्रपुर का ‘असली’ जन्मस्थान

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखें तो आधुनिक चंद्रपुर को गोंड राजाओं ने बसाया था, लेकिन इस क्षेत्र का मानव इतिहास 50,000 साल पुराना है. जरपत और इराई नदियों के तट हमेशा से इंसानी बस्तियों के पसंदीदा ठिकाने रहे हैं. आज से 3,000 साल पहले भी जरपत नदी के पास पापमिया पहाड़ी (जहां आज मेडिकल कॉलेज है) और इराई नदी के किनारे आरवत गांव के पास घनी बस्तियां थीं.

पठानपुरा गेट से महज 1.2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह ‘बोर रीठ’ गांव ही असल में आज के चंद्रपुर शहर का ‘मूल आधार’ या पहला प्रामाणिक गांव है.

राजाओं के राज से पहले की सभ्यता

गोंड राजाओं और भोसले शासकों के आने से सदियों पहले, यह पूरा इलाका सातवाहन और वाकाटक राजाओं के अधीन था. इसके बाद 10वीं शताब्दी के आसपास वानी और चांदा क्षेत्र के राजगोंड समुदाय ने यहां अपना साम्राज्य स्थापित किया और शिरपुर, बल्लाल शाह व चंद्रपुर से शासन चलाया.

बाद में नागपुर के भोसले राजाओं और फिर अंग्रेजों ने इस शहर का आधुनिक विकास किया. परंतु, इन सभी लिखित इतिहासों के बीच ‘बोर रीठ’ से मिले पाषाण युगीन औजार और मूर्तियां यह चीख-चीख कर कहती हैं कि चंद्रपुर की सभ्यता का असली जन्म इसी गुमनाम हो चुके गांव से हुआ था.

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-भारत एक्सप्रेस 

Shubhra Rai

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