Chhattisgarh UCC Draft On Live In Relationship: भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों और संस्कृतियों का मिलन माना जाता रहा है. आधुनिक जीवनशैली के साथ तेजी से उभरे लिव-इन रिलेशनशिप के चलन को अब कानूनी जवाबदेही और सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाने की तैयारी शुरू हो चुकी है. छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर चल रही कवायद अब अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है. राज्य में प्रस्तावित यूसीसी मसौदे के तहत लिव-इन में रहने को लेकर भी नियम हैं. यही इन दिनों चर्चा का विषय बना है.
मसौदे के तहत लिव-इन में रहने वाले जोड़ों के लिए अब सिर्फ सहमति से साथ रहना काफी नहीं होगा. उन्हें अपने रिश्ते का सरकारी पंजीयन कराना अनिवार्य हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय समिति 30 नवंबर तक अपनी अंतिम रिपोर्ट सरकार को सौंपने जा रही है.
रजिस्ट्रार के पास अनिवार्य पंजीयन: लिव-इन में रहने का फैसला करने वाले युवक-युवतियों को संबंधित रजिस्ट्रार के समक्ष अपने रिश्ते की आधिकारिक जानकारी दर्ज करानी होगी.
ब्रेकअप की भी देनी होगी सूचना: यदि दोनों में से कोई एक साथी या दोनों आपसी सहमति से अलग होना चाहते हैं, तो रिश्ता खत्म करने की लिखित सूचना भी रजिस्ट्रार को देनी होगी. इस सूचना की एक प्रति दूसरे पार्टनर को भेजी जाएगी.
नियम तोड़ा तो जेल और जुर्माना: तय समयसीमा में रजिस्ट्रेशन न कराने या नियमों की अनदेखी करने पर जुर्माना और जेल तक की सजा का प्रावधान विचाराधीन है.
इस मसौदे का सबसे मानवीय और संवेदनशील पहलू महिलाओं और बच्चों को सामाजिक सुरक्षा कवच देना है. रिश्ता टूटने की स्थिति में महिला साथी आर्थिक रूप से असहाय न हो, इसके लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में गुजारा भत्ते के लिए आवेदन करने का वैधानिक अधिकार मिल सकता है.
यूसीसी का दायरा केवल लिव-इन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विवाह और उत्तराधिकार के कई पुराने नियमों को भी एक सूत्र में पिरोने का प्रयास है. सभी धर्मों और वर्गों के लिए विवाह का सरकारी पंजीकरण अनिवार्य करने की सिफारिश की गई है. अलग-अलग मजहबी मान्यताओं के स्थान पर सभी नागरिकों के लिए तलाक और भरण-पोषण की एक समान कानूनी प्रक्रिया लागू होगी.
बस्तर और सरगुजा संभाग के आदिवासी समाज ने अपनी पारंपरिक व्यवस्थाओं, रूढ़ियों और रीति-रिवाजों को लेकर चिंता जताई है. समिति के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि कानून बनाते समय जनजातीय समाज की सांस्कृतिक पहचान और विशिष्ट परंपराओं को पूर्ण सुरक्षा मिले.
पारंपरिक मर्यादा और आधुनिक जीवनशैली के बीच संतुलन साधना आज के समाज की सबसे बड़ी जरूरत है. लिव-इन संबंधों में अक्सर विवाद, धोखाधड़ी या अलग होने के बाद महिलाओं और बच्चों के बेसहारा होने के मामले सामने आते रहे हैं.
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छत्तीसगढ़ यूसीसी का यह प्रस्तावित मसौदा किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को छीनने के बजाय, रिश्ते में बंधे हर पक्ष को कानूनी संबल और जवाबदेही देने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है. 30 नवंबर को रिपोर्ट पेश होने के बाद तय होगा कि छत्तीसगढ़ में समानता और सामाजिक सुरक्षा का यह नया ढांचा किस रूप में कानून का हिस्सा बनता है.
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