आज (बुधवार) को नई दिल्ली में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने कहा है कि अतिक्रमण कोई छोटी या स्थानीय समस्या नहीं, समाज और विकास के शरीर में फैलता हुआ कैंसर है. चाहे अतिक्रमण किसी पड़ोसी की निजी संपत्ति पर किया गया हो या सरकारी जमीन पर—परिणाम हर स्थिति में एक जैसा होता है. इससे कानून व्यवस्था कमजोर पड़ती है, विकास की गति रुकती है और आम नागरिक को रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. मंच का कहना है कि जब सरकार और प्रशासन अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई करते हैं, तो यह कोई मनमानी नहीं, समाज के हित में किया गया ज़रूरी, संवैधानिक और अनिवार्य “ऑपरेशन” होता है, जिसे टाला नहीं जा सकता. मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने नागरिकों से अपील की है कि वे शांति बनाए रखें, किसी के बहकावे में न आएं और कानून को अपना काम करने दें.
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने कहा कि अतिक्रमण से लाभ हमेशा कुछ गिने-चुने लोगों को मिलता है, लेकिन उसकी कीमत पूरा समाज चुकाता है. सड़कों पर किए गए अतिक्रमण से ट्रैफिक जाम आम बात हो जाती है, जिससे एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड और अन्य आपात सेवाएं समय पर नहीं पहुंच पातीं. सरकारी जमीन पर अवैध कब्जों के कारण स्कूल, अस्पताल, सड़क, नाली, सीवर, बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं के विकास में बाधा आती है. नतीजतन, जनहित की योजनाएं कागज़ों में सिमट जाती हैं और आम नागरिक रोज़-रोज़ की अव्यवस्थाओं से जूझता रहता है.
मंच ने साफ कहा कि अतिक्रमण का कोई धर्म, जाति या मजहब नहीं होता—यह पूरी तरह कानून का विषय है. यदि किसी एक मामले में अतिक्रमण को नज़र अंदाज़ किया गया, तो वही मिसाल आगे चलकर पूरे तंत्र को खोखला कर देगी. कानून का राज तभी कायम रह सकता है, जब नियम सबके लिए समान हों. जिन स्थानों पर कार्रवाई हुई, यदि वहां के वैध दस्तावेज होते, तो यह स्थिति पैदा ही नहीं होती. दस्तावेज़ों का अभाव अपने आप में यह साबित करता है कि कब्जा अवैध था. और जिन लोगों को लगता हो कि ये मुस्लिम इलाके में साफ सफाई का जानबूझकर कार्यक्रम किया जा रहा है तो वो याद करें मनमोहन सिंह सरकार का वो दौर जब सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद पूरी दिल्ली में डिमोलिशन ड्राइव चलाई गई थी. उस डिमोलिशन ड्राइव के पहले दिल्ली सिकुड़ी हुई थी, लोगों ने सड़कों पर कब्जा कर रखा था, यातायात की समस्या विकराल रूप ले चुकी थी. उस समय के हिसाब से विरोध भी बहुत हुआ परन्तु न्यायालय या सरकार किसी की शत्रु नहीं होती हैं. डिलोमिशन ड्राइव तब सही थी तो अब भी सही है और कानून के दायरे में रह कर है.
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने यह भी रेखांकित किया कि हालिया अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई अचानक नहीं की गई. इसके लिए अदालत का आदेश तीन महीने पहले ही जारी हो चुका था. कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि तय समय सीमा के अंदर अवैध अतिक्रमण हटाया जाए. इसका मतलब यह है कि संबंधित लोगों के पास या तो स्वयं अतिक्रमण हटाने का पर्याप्त समय था, या फिर अदालत में अपने वैध दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर. इसके बावजूद यदि अतिक्रमण बना रहा, तो इसके लिए प्रशासन को दोषी ठहराना न तो उचित है और न ही न्यायसंगत.
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के अनुसार, सरकार और प्रशासन के सामने अक्सर दो ही विकल्प होते हैं—या तो अतिक्रमण को बढ़ने दिया जाए और पूरे इलाके को अव्यवस्था की ओर धकेल दिया जाए, या फिर कठोर लेकिन ज़रूरी कदम उठाए जाएं. विकास तभी संभव है, जब भूमि अतिक्रमण मुक्त हो. सड़क चौड़ी करनी हो, सीवर लाइन बिछानी हो, जलभराव रोकना हो या किसी सार्वजनिक सुविधा का निर्माण—हर जगह अतिक्रमण सबसे बड़ी रुकावट बनता है. ऐसे में प्रशासन द्वारा की गई कार्रवाई उसकी मजबूरी भी है और संवैधानिक जिम्मेदारी भी.
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने अतिक्रमण के खिलाफ प्रशासन की कार्रवाई के दौरान शांति बनाए रखने की अपील की है. मंच ने कहा कि विरोध, पथराव या अफवाहें फैलाने से न तो अतिक्रमण वैध हो जाता है और न ही समस्या का समाधान निकलता है. कानून को अपना काम करने देना ही एक जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य है. अदालत और प्रशासन की प्रक्रिया में सहयोग करना समाज के दीर्घकालिक हित में है.
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच का कहना है कि यदि आज अतिक्रमण के खिलाफ सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो कल यही अतिक्रमण पूरे शहरों को रहने लायक नहीं छोड़ेगा. सरकार का यह कदम किसी व्यक्ति या समुदाय के खिलाफ नहीं, कानून, विकास और आम जनता के पक्ष में है. अतिक्रमण हटाना भले ही तात्कालिक रूप से दर्दनाक लगे, लेकिन जैसे कैंसर का इलाज बिना ऑपरेशन संभव नहीं, वैसे ही समाज और शहरों का विकास अतिक्रमण हटाए बिना संभव नहीं. यही सच्चाई है और यही समय की सबसे बड़ी मांग भी.
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने पुलिस और प्रशासन के आधिकारिक बयानों का समर्थन करते हुए कहा कि जॉइंट CP मधुर वर्मा और DCP निधिन वल्सन ने स्पष्ट किया है कि पूरी कार्रवाई कोर्ट के आदेश के अनुसार की गई. पथराव की कोशिश को संयम और न्यूनतम बल के साथ रोका गया. प्रशासन के अनुसार स्थिति अब पूरी तरह नियंत्रण में है और इलाके में शांति बनाए रखने के लिए पर्याप्त पुलिस बल तैनात है.
मंच ने यह तथ्य भी सामने रखा कि 6 जनवरी 2026 को मस्जिद कमेटी द्वारा हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई थी, जिस पर कोर्ट ने नोटिस जारी किया. हालांकि MCD ने स्पष्ट किया कि डिमोलिशन ड्राइव पहले से तय थी और यह 12 नवंबर के पुराने कोर्ट ऑर्डर के तहत ही की गई. यानी कार्रवाई किसी नई सुनवाई के बाद नहीं, बल्कि पहले से दिए गए न्यायिक आदेश के अनुपालन में हुई.
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने फैलाई जा रही अफवाहों को खारिज करते हुए कहा कि फैज़-ए-इलाही मस्जिद के मुख्य ढांचे को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया गया. मस्जिद की मूल 0.195 एकड़ जमीन को छुआ तक नहीं गया. कार्रवाई केवल उन ढांचों पर की गई, जिन्हें MCD ने अवैध और व्यावसायिक उपयोग वाला बताया. इनमें मस्जिद से सटा बारात घर/बैंक्वेट हॉल का एक हिस्सा, 2 से 3 डिस्पेंसरी या डायग्नोस्टिक सेंटर, कुछ दुकानें और अन्य निर्माण शामिल हैं, जो सार्वजनिक जमीन पर बने थे. इस तरह 38,940 वर्ग फीट सार्वजनिक जमीन से अतिक्रमण हटाया गया है.
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने कहा कि सरकार, प्रशासन और न्यायपालिका द्वारा उठाया गया यह कदम कानून के राज, सामाजिक संतुलन और भविष्य के विकास के लिए आवश्यक है. अतिक्रमण के खिलाफ सख्ती पूरे समाज के हित में है. शांति, सहयोग और कानून का सम्मान ही किसी भी लोकतांत्रिक समाज की असली पहचान है.
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-भारत एक्सप्रेस
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