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भारतीय पर्यावरण आंदोलन के महान संरक्षक थे माधव गाडगिल

प्रख्यात पर्यावरणविद् और इकोलॉजिस्ट माधव गाडगिल का 83 वर्ष की आयु में निधन हो गया है. बीती रात पुणे में उन्हों अंतिम सांस ली. उनके निधन की खबर ने भारत के पर्यावरण आंदोलन और पारिस्थितिकी विज्ञान के क्षेत्र में एक गहरा शोक की लहर पैदा कर दी है.

माधव गाडगिल को ‘धरती पुत्र’ और ‘आम जनता का वैज्ञानिक’ कहा जाता था. उन्होंने अपने छह दशकों से अधिक के करियर में विज्ञान को केवल प्रयोगशालाओं और शोध पत्रों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे समाज, स्थानीय समुदायों और प्रकृति से गहराई से जोड़ा. उनकी सोच का केंद्रबिंदु हमेशा टिकाऊ विकास और सामुदायिक भागीदारी रहा.

पश्चिमी घाट संरक्षण में ऐतिहासिक योगदान

माधव गाडगिल का सबसे महत्वपूर्ण योगदान पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (Western Ghats Ecology Expert Panel) की अध्यक्षता में तैयार की गई रिपोर्ट है, जिसे गाडगिल रिपोर्ट के नाम से जाना जाता है. 2011 में प्रस्तुत इस रिपोर्ट ने पश्चिमी घाट के संवेदनशील जैव-विविधता क्षेत्र को बचाने के लिए कड़े उपाय सुझाए थे. रिपोर्ट में विकास परियोजनाओं को पर्यावरणीय संतुलन के साथ जोड़ने की वकालत की गई थी, साथ ही स्थानीय लोगों को संरक्षण में भागीदार बनाने पर जोर दिया गया था.

हालांकि रिपोर्ट को पूरी तरह लागू नहीं किया गया, लेकिन इसने भारत में पर्यावरण नीति, सार्वजनिक बहस और जलवायु न्याय के विमर्श को नई दिशा दी. पश्चिमी घाटों को यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित करने में भी उनके कार्य का महत्वपूर्ण योगदान रहा.

सम्मान और उपलब्धियां

  • पद्मश्री (1981)
  • पद्मभूषण (2006)
  • Champions of the Earth पुरस्कार (2024) – संयुक्त राष्ट्र द्वारा दिया जाने वाला पर्यावरण का सर्वोच्च सम्मान

उन्होंने सैकड़ों शोध पत्र प्रकाशित किए और कई पुस्तकें लिखीं, जिनमें उनकी किताबें जैसे ‘Ecological Journeys’ और  ‘This Fissured Land’ (रामचंद्र गुहा के साथ सह-लेखन) विशेष रूप से चर्चित रहीं.

आज जब जलवायु परिवर्तन, वन विनाश, बाढ़- सूखा और प्राकृतिक आपदाएं लगातार बढ़ रही हैं, माधव गाडगिल जैसे वैज्ञानिक की कमी बहुत खलेगी. वे न केवल एक शोधकर्ता थे, बल्कि एक सामाजिक योद्धा भी थे जो विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की वकालत करते रहे.

उनकी विरासत आज भी जीवित है. स्थानीय समुदायों में, युवा पर्यावरण कार्यकर्ताओं में और उन नीतियों में जो टिकाऊ भविष्य की नींव रख रही हैं.

भारतीय पर्यावरण आंदोलन ने एक महान संरक्षक खो दिया है.

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-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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