देश

‘धर्म’ और ‘मजहब’ के बीच अंतर बताने से जुड़ी जनहित याचिका को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार को दिए निर्देश

Delhi News: दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह ‘धर्म’ और ‘मजहब’ के बीच अंतर करने और प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों के पाठ्यक्रम में इस विषय पर एक अध्याय शामिल करने की मांग करने वाली जनहित याचिका को प्रतिनिधित्व के रूप में ले. अदालत ने कहा हम धार्मिक या दार्शनिक अधिकारियों के रूप में कार्य नहीं करते.

मुख्य न्यायाधीश मनोनीत न्यायमूर्ति मनमोहन और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की खंडपीठ ने केंद्रीय संस्कृति और शिक्षा मंत्रालयों को कानून के अनुसार यथाशीघ्र याचिका पर निर्णय लेने का निर्देश दिया.

यह जनहित याचिका अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर की गई थी. न्यायालय ने उपाध्याय से कहा- न्यायालय धार्मिक या दार्शनिक अधिकारियों के रूप में कार्य नहीं करते हैं. यहां थोड़ी सी गलती है. आप हमें अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग लेनदेन और दार्शनिकों और धार्मिक विशेषज्ञों के विशेषज्ञ समझ रहे हैं. हम इस सब में शामिल होने वाले कोई नहीं हैं. मुझे नहीं पता कि ये याचिकाएं इस न्यायालय में क्यों आ रही हैं. हमारा इससे कोई लेना-देना नहीं है.

हम स्कूल के पाठ्यक्रम पर निर्णय नहीं लेते: पीठ 

पीठ ने आगे टिप्पणी की कि न्यायालय इस मुद्दे में नहीं पड़ सकता क्योंकि इस पर केवल केंद्र सरकार ही निर्णय ले सकती है. मंत्रालय इस पर निर्णय लेगा. हम इस सब में नहीं पड़ रहे हैं. आप स्कूल के पाठ्यक्रम में कुछ अध्याय चाहते हैं. हम स्कूल के पाठ्यक्रम पर निर्णय नहीं लेते. यदि हम स्कूल के पाठ्यक्रम में अध्याय जोड़ना शुरू कर देते हैं तो मुझे लगता है कि मामला यहीं समाप्त हो जाएगा.

पीठ ने कहा कि उपाध्याय मूलतः न्यायालय से यह अपेक्षा कर रहे थे कि वह शब्दार्थ में अभ्यास करे तथा धर्म और मजहब के बीच अंतर निर्धारित करने के लिए धार्मिक और दार्शनिक प्राधिकरण की भूमिका ग्रहण करे जो कि उसके संवैधानिक अधिदेश से परे है. न्यायालय ने कहा- भाषा, उसका प्रयोग और अर्थ समाज के जैविक विकास के उत्पाद हैं, तथा न्यायालय उन्हें निर्धारित नहीं कर सकते, सिवाय इसके कि जब वे अश्लील हों या कानून की भावना और अक्षर के विपरीत हों.

धर्म का उचित अर्थ इस्तेमाल करने की मांग उठी

याचिका में केंद्र और दिल्ली सरकार को धर्म का उचित अर्थ इस्तेमाल करने का निर्देश देने की भी मांग की गई है, जो उपाध्याय के अनुसार पंथ या संप्रदाय है न कि धर्म जैसा, जन्म प्रमाण पत्र, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, बैंक खाता, जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र आदि जैसे सरकारी दस्तावेजों में समानार्थी के रूप में.

धर्म और रिलीजन के बिल्कुल अलग-अलग अर्थ 

याचिकाकर्ता ने कहा है कि धर्म और रिलीजन के बिल्कुल अलग-अलग अर्थ हैं, लेकिन केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारी और कर्मचारी न केवल जन्म प्रमाण पत्र, आधार कार्ड, स्कूल प्रमाण पत्र, राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, निवास प्रमाण पत्र, मृत्यु प्रमाण पत्र और बैंक खाता आदि जैसे दस्तावेजों में धर्म शब्द का इस्तेमाल धर्म के समानार्थी के रूप में करते हैं, बल्कि अपने मौखिक और लिखित संचार में भी करते हैं.

गोपाल कृष्ण

Recent Posts

‘चिन्मय मिशन सिर्फ संस्था नहीं, एक विचार है’, पीएम मोदी ने किया चिन्मय अमृत महोत्सव का उद्घाटन

Chinmaya Mission: पीएम नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली के भारत मंडपम में चिन्मय अमृत महोत्सव…

41 minutes ago

‘सादगी और सत्यनिष्ठा की मिसाल…’ पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत की जयंती पर अमित शाह ने किया नमन

Amit Shah Tribute: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने देश के पूर्व उपराष्ट्रपति और भाजपा…

1 hour ago

भक्ति में डूबा चंडीगढ़: भागवत कथा के समापन पर छलके बी प्राक के आंसू, अगले साल राम कथा का ऐलान

Chandigarh News: चंडीगढ़ में आयोजित सात दिवसीय श्री भागवत कथा के समापन पर पंजाबी गायक…

1 hour ago

WiFi में नहीं चलेगा WhatsApp! 1 जनवरी से क्या बदल रहे है भारत सरकार?

WhatsApp SIM Binding Rule: केंद्र सरकार ने साइबर धोखाधड़ी और मोबाइल नंबरों के दुरुपयोग को…

2 hours ago

खालिस्तान नेशनल आर्मी के नाम से आई धमकी, मुंबई मेयर ऑफिस से लेकर सुपरस्टार तक बढ़ाई गई सुरक्षा

Mumbai mayor bomb threat: मुंबई की मेयर रितु तावड़े को एक धमकी भरा ईमेल मिला…

2 hours ago

ट्रक की टक्कर, लहूलुहान ड्राइवर… और फिर सड़क पर शुरू हो गया ‘टमाटर लूट’ का खेल

Jabalpur News: छिंदवाड़ा से कटनी जा रहे टमाटर से लदे पिकअप वाहन को जबलपुर में…

3 hours ago