जॉन ब्रिटास
विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन नियम, 2026 को लेकर देश की राजनीति में नई बहस छिड़ गई है. राज्यसभा सांसद डॉ. जॉन ब्रिटास ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को एक विस्तृत पत्र लिखकर इन संशोधनों को तुरंत वापस लेने की मांग की है. उनका कहना है कि ये बदलाव सिर्फ तकनीकी या प्रशासनिक सुधार नहीं हैं, बल्कि देश के स्वैच्छिक और सामाजिक संगठनों के कामकाज पर सीधा और गहरा असर डाल सकते हैं.
डॉ. ब्रिटास ने अपने पत्र में इन नियमों को लेकर गंभीर चिंता जताई है. उनका कहना है कि FCRA 2010 लागू होने के बाद यह सबसे व्यापक सरकारी हस्तक्षेपों में से एक है. उनके अनुसार, नए संशोधन केवल विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के पूरे संचालन ढांचे को प्रभावित करते हैं.
उन्होंने आरोप लगाया कि इन नियमों के जरिए सरकार को ज्यादा अधिकार मिल जाते हैं, जिससे निर्णय लेने में विवेकाधिकार बढ़ जाता है और संगठनों की स्वतंत्रता सीमित हो सकती है. साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि इससे संस्थाओं पर व्यक्तिगत जवाबदेही का दबाव बढ़ेगा और निगरानी तंत्र पहले से कहीं अधिक सख्त हो जाएगा.
इस पूरे मुद्दे में सबसे ज्यादा विवाद उस प्रावधान को लेकर है जिसमें ‘धर्मांतरण प्रचार’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है. ब्रिटास का कहना है कि इस शब्द की कोई स्पष्ट और कानूनी परिभाषा तय नहीं की गई है. ऐसे में इसकी व्याख्या पूरी तरह अधिकारियों के विवेक पर छोड़ दी जाएगी, जिससे मनमाने फैसलों की आशंका बढ़ सकती है.
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि इसका असर संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मिलने वाले धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार पर पड़ सकता है. यानी धार्मिक गतिविधियों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनावश्यक रोक लगने का खतरा पैदा हो सकता है.
पत्र में एक और अहम मुद्दा उठाया गया है, जिसमें कहा गया है कि नए नियमों के तहत संगठनों को अपने प्रकाशनों, लेखों, वेबसाइटों, सोशल मीडिया अकाउंट्स और अन्य संचार माध्यमों की विस्तृत जानकारी देनी होगी. ब्रिटास का मानना है कि यह सिर्फ वित्तीय पारदर्शिता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक निगरानी व्यवस्था की तरह काम कर सकता है.
डॉ. ब्रिटास ने अपने पत्र में यह भी कहा है कि ये संशोधन संविधान के कई अहम अनुच्छेदों—14, 19(1)(c), 25, 26, 29 और 30—के तहत दिए गए अधिकारों से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करते हैं. उनके अनुसार, ये बदलाव नागरिक समाज की स्वतंत्रता और संगठनात्मक अधिकारों को प्रभावित कर सकते हैं.
अंत में उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की है कि इन संशोधनों को तुरंत वापस लिया जाए और किसी भी नए नियम को लागू करने से पहले व्यापक परामर्श प्रक्रिया अपनाई जाए, जिसमें सभी हितधारकों की राय शामिल हो.
भारत एक्सप्रेस
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