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वैश्विक मंच पर ‘स्वराज’: ग्लोबल साउथ की आवाज बनकर कैसे उभरा भारत; G20 से लेकर वॉयस समिट तक पूरा विश्लेषण

Global South India Diplomacy Swaraj G20: भारत में ‘स्वराज’ का अर्थ लंबे समय तक विदेशी शासन से मुक्ति और अपने फैसले खुद लेने के अधिकार से जुड़ा रहा है. वैश्विक राजनीति के संदर्भ में यही विचार अब रणनीतिक स्वायत्तता और विकासशील देशों की निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी से जुड़ता दिखाई देता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अधिक प्रमुखता देने की कोशिश की है. वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट और भारत की G20 अध्यक्षता इस दिशा में प्रमुख उदाहरण रहे हैं.

वैश्विक मंच पर स्वराज का क्या अर्थ है?

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वराज का अर्थ केवल स्वतंत्र निर्णय लेना नहीं, बल्कि अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार साझेदारियां तय करने की क्षमता भी है. इसका मतलब वैश्विक संस्थाओं से दूरी बनाना नहीं, बल्कि उनमें विकासशील देशों की आवाज को अधिक प्रभावी बनाना है. ग्लोबल साउथ कोई पूरी तरह भौगोलिक श्रेणी नहीं है. आम तौर पर इस शब्द का इस्तेमाल एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और कैरेबियन समेत विकासशील देशों के व्यापक समूह के लिए किया जाता है. इन देशों की साझा चुनौतियों में विकास वित्त, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य, तकनीकी अंतर और रोजगार जैसे मुद्दे शामिल हैं.

Voice of Global South Summit बना अहम मंच

भारत ने 12-13 जनवरी 2023 को पहली बार वर्चुअल Voice of Global South Summit की मेजबानी की. ‘Unity of Voice, Unity of Purpose’ थीम के तहत 125 देशों की भागीदारी हुई. विदेश मंत्रालय के अनुसार, इसका उद्देश्य विकासशील देशों की प्राथमिकताओं और चिंताओं को एक साझा मंच देना था. इस पहल का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि भारत ने इन देशों से मिले सुझावों को अपनी 2023 की G20 अध्यक्षता से जोड़ने की कोशिश की. सम्मेलन में वित्त, ऊर्जा, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण, व्यापार और तकनीक जैसे विषयों पर चर्चा हुई.

G20 अध्यक्षता में ग्लोबल साउथ पर फोकस

भारत की 2023 G20 अध्यक्षता ने इस कूटनीतिक प्रयास को बड़ा मंच दिया. नई दिल्ली में हुए G20 शिखर सम्मेलन में अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्य के रूप में शामिल किया गया. भारत के विदेश मंत्रालय ने इसे ग्लोबल साउथ की भागीदारी मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है. भारत ने G20 के दौरान डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, विकास वित्त, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा तथा जलवायु से जुड़े मुद्दों को भी प्रमुखता दी. इसका उद्देश्य विकासशील देशों के सामने मौजूद व्यावहारिक चुनौतियों को बड़े बहुपक्षीय मंच की चर्चा का हिस्सा बनाना था.

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South-South Cooperation क्यों महत्वपूर्ण?

ग्लोबल साउथ की कूटनीति का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू South-South Cooperation यानी विकासशील देशों के बीच सहयोग है. इसका आधार यह विचार है कि देश अपने अनुभव, तकनीक, प्रशिक्षण और विकास मॉडल एक-दूसरे के साथ साझा कर सकते हैं. भारत डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, आपदा प्रबंधन और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में अपने अनुभव साझा करने की बात करता रहा है. हालांकि, किसी भी मॉडल को दूसरे देश में लागू करने से पहले स्थानीय जरूरतों और परिस्थितियों के अनुसार उसमें बदलाव जरूरी होता है.

सामने हैं कई चुनौतियां

ग्लोबल साउथ को एक समान समूह मानना आसान नहीं है. विकासशील देशों की आर्थिक स्थिति, ऊर्जा जरूरतें, जलवायु संबंधी प्राथमिकताएं और विदेश नीति के हित अलग-अलग हो सकते हैं. इसलिए भारत के लिए चुनौती यह है कि वह इन विविध हितों के बीच संवाद और सहमति का रास्ता बनाए. इसके अलावा, किसी देश की वैश्विक नेतृत्व की भूमिका केवल घोषणाओं से तय नहीं होती. साझेदार देशों के साथ किए गए सहयोग का जमीन पर असर, स्थानीय क्षमता निर्माण और दीर्घकालिक भरोसा भी महत्वपूर्ण हैं.

स्वराज से वैश्विक साझेदारी तक

भारत की ग्लोबल साउथ कूटनीति को स्वराज की व्यापक अवधारणा से जोड़कर देखा जा सकता है. यहां स्वराज का अर्थ अलग-थलग रहना नहीं, बल्कि स्वतंत्र निर्णय लेते हुए ऐसी साझेदारियां बनाना है जो राष्ट्रीय और साझा विकास लक्ष्यों को आगे बढ़ाएं. Voice of Global South Summit, G20 में अफ्रीकी संघ की स्थायी सदस्यता और South-South Cooperation जैसे प्रयासों ने भारत को विकासशील देशों की चिंताओं को अंतरराष्ट्रीय विमर्श में उठाने के लिए मंच दिए हैं. पहली समिट के बाद नवंबर 2023 में दूसरा और अगस्त 2024 में तीसरा Voice of Global South Summit भी आयोजित हुआ.

आने वाले समय में इस प्रयास की अहमियत इस बात से तय होगी कि विकासशील देशों की प्राथमिकताएं वैश्विक नीतियों, वित्तीय संस्थानों, जलवायु वार्ताओं, तकनीकी नियमों और बहुपक्षीय संस्थाओं में किस हद तक व्यावहारिक परिणामों में बदलती हैं. भारत के लिए यही वह बिंदु होगा जहां ‘स्वराज’ की ऐतिहासिक अवधारणा वैश्विक साझेदारी और निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रभावी भागीदारी के विचार से जुड़ती है.

भारत एक्सप्रेस

Swati Pandey

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