BRICS India strategic policy: पश्चिम में अभी भी गैर-गुटनिरपेक्षता को अक्सर एक नैतिक मुद्रा या जिम्मेदारी से बचने का तरीका माना जाता है. यह सोच शीत युद्ध काल के पूर्वाग्रहों से जन्मी है. लेकिन वैश्विक व्यवस्था के टूटने विशेषकर अमेरिका जैसी महाशक्तियों की विदेश नीतियों की अनिश्चितता ने भारत के इस सिद्धांत की प्रासंगिकता को फिर से रेखांकित किया है. जब अतिव्यापी और कभी-कभी विरोधाभासी समूह आम हो गए हैं, तब भारत की लचीली मुद्रा उसकी सबसे बड़ी ताकत साबित हो सकती है. ब्रिक्स शिखर सम्मेलन नई दिल्ली में शुरू हो रहा है, जो समूह के बीस वर्ष पूरे होने का अवसर है. भारत की विदेश नीति को इसी नजरिए से देखना जरूरी है.
ब्रिक्स स्वयं सुविधा का गठबंधन है. चीन और रूस इसे पश्चिमी संस्थागत प्रभुत्व को चुनौती देने का औजार मानते हैं, जबकि भारत और ब्राजील इसे नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था में सुधार का मंच समझते हैं. दिलचस्प बात यह है कि डॉलर-मुक्त व्यवस्था की बात करने के बावजूद रूस और चीन अमेरिका के साथ जुड़ाव बनाए रखते हैं, खासकर डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के दौरान. भारत सीमा सुरक्षा के मुद्दे पर चीन से स्पष्ट रूप से अलग खड़ा है और ब्रिक्स सदस्यता विस्तार के चीन के विचार पर सावधानी बरत रहा है.
इस भू-राजनीतिक परिदृश्य में अगर भारत पूरी तरह किसी एक पक्ष के साथ जुड़ जाता, तो उसके पास ब्रिक्स के अंदर बहस को आकार देने की लचीलापन नहीं होता. साथ ही क्वाड के जरिए अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ रक्षा व प्रौद्योगिकी सहयोग गहरा करने की गुंजाइश भी कम हो जाती.
यह रुख पश्चिम एशिया के चल रहे संघर्ष में सबसे साफ नजर आया. भारत की विश्वसनीयता इस क्षेत्र में एक अनोखी संपत्ति पर टिकी है. उन पक्षों के साथ मैत्री जो एक-दूसरे पर गहरी शंका रखते हैं. ईरान के साथ पुराने सामाजिक-सांस्कृतिक और व्यापारिक रिश्ते, इजरायल के साथ रक्षा सहयोग, तथा संयुक्त अरब अमीरात के साथ रणनीतिक साझेदारी (ऊर्जा सुरक्षा, मुक्त व्यापार समझौता और बड़ी प्रवासी आबादी, जिसकी प्रेषित राशि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है) ये सभी संबंध ठोस हैं लेकिन दमघोंटू नहीं. भारत ने वाशिंगटन और पश्चिम एशियाई राजधानियों दोनों के दबाव का विरोध किया कि इन रिश्तों को एक-दूसरे के विरोधी मान लिया जाए.
क्लासिकल गैर-गुटनिरपेक्षता आज के तरल बहुध्रुवीय युग के लिए पुरानी शब्दावली है. इसमें विभिन्न क्षेत्रों और भूगोलों में उभरती रणनीतिक जरूरतें शामिल हैं. भारत ने जो हासिल किया है, वह है स्पष्ट क्षेत्रों और खिलाड़ियों से आगे जाकर रणनीतिक साझेदारियों का विस्तार. बेल्जियम और उज्बेकिस्तान के साथ हालिया समझौते इसी का उदाहरण हैं. ब्रिक्स जैसे जटिल समूह के लिए रिश्ते बनाने का यही व्यापक नजरिया काम करता है. प्रभुत्व की एकाधिकारवादी दौड़ निश्चित रूप से नहीं.
यह कहना अतिश्योक्ति नहीं कि भारत गांधीवादी सिद्धांत को आत्मसात कर रहा है. सहकारी समितियों को स्वायत्त निर्णय लेने वाले ब्लॉकों में बदलने का सिद्धांत. गांधी के विचार अति-स्थानीय, गांव-आधारित सहकारिता पर केंद्रित थे, अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों पर नहीं. लेकिन एक से अधिक एजेंटों का आपसी लाभ के लिए साथ काम करने का मूल सिद्धांत वही है. विवाद सुलझाना, समानताएं खोजना और प्रतिस्पर्धा के बिना एक साथ उभरना इन चुनौतियों के कोई तैयार जवाब नहीं हैं. लेकिन आज सभी पुराने टेम्पलेट बेकार हो चुके हैं.
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आज भारत अपनी गैर-गुटनिरपेक्ष स्थिति के लाभ प्रदर्शित करने की अच्छी स्थिति में है. पश्चिम एशिया में अमेरिकी सुरक्षा गारंटियों के पतन के बाद. वह अपने ब्रिक्स साझेदारों को यह संदेश दे सकता है कि शक्ति गुटों से प्रतिबद्ध न होना लंबे समय में बुरा विचार नहीं हो सकता. रणनीतिक स्वायत्तता का सबसे बड़ा उपहार यह अंतर्निहित प्रेरणा है कि बाहरी इशारे करने से पहले अंदर से मजबूत बनो. भारत लंबे समय से इन्हीं नींवों को मजबूत कर रहा है.
भारत की यह मुद्रा न तो निष्क्रियता है और न ही नैतिक दिखावा. यह व्यावहारिक लचीलापन है, जो जटिल दुनिया में अपने हितों की रक्षा और विस्तार दोनों को संभव बनाता है. ब्रिक्स की बीसवीं वर्षगांठ पर यही संदेश सबसे प्रासंगिक है.
-भारत एक्सप्रेस
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