Lala Lajpat Rai Jayanti 2026: आज 28 जनवरी है. यह दिन भारत के इतिहास में बेहद खास है, क्योंकि आज ही के दिन पंजाब की धरती पर एक ऐसे शेर ने जन्म लिया था जिसकी दहाड़ से लंदन तक बैठी अंग्रेज हुकूमत कांप उठती थी. हम बात कर रहे हैं ‘पंजाब केसरी’ लाला लाजपत राय की. एक ऐसे क्रांतिकारी, जिन्होंने 63 साल की उम्र में वो साहस दिखाया जो शायद युवाओं के लिए भी मुमकिन न हो.
बात साल 1927 की है. ब्रिटिश सरकार ने भारत में संवैधानिक सुधारों की जांच के लिए ‘साइमन कमीशन’ बनाया. नियम के मुताबिक इसमें सात सदस्य थे, लेकिन हैरानी और गुस्से की बात यह थी कि इनमें एक भी भारतीय नहीं था. इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि फैसला हमारे देश के भविष्य का होना था, और फैसले लेने वाले सभी सात लोग गोरे अंग्रेज थे. भारतीयों को इस कमीशन से बाहर रखने की सलाह लॉर्ड इरविन ने दी थी. कांग्रेस से लेकर आम जनता तक, हर कोई इस अपमान से उबल रहा था. हर तरफ ‘साइमन गो बैक’ के नारे गूंजने लगे थे.
30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में इस कमीशन का विरोध करने के लिए एक शांतिपूर्ण जुलूस निकाला गया. इसकी कमान संभाली थी वयोवृद्ध लाला लाजपत राय ने. हाथों में काले झंडे और जुबां पर आजादी की मांग… भीड़ को बढ़ता देख पुलिस सुपरिटेंडेंट जेम्स ए. स्कॉट बौखला गया. उसने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज का क्रूर आदेश दे दिया.
उस वक्त लाला जी की उम्र 63 साल थी, लेकिन वे टस से मस नहीं हुए. पुलिस की लाठियां उनके सीने पर बरसती रहीं, खून बहता रहा, लेकिन उनका जज्बा नहीं टूटा. उसी घायल अवस्था में उन्होंने वो ऐतिहासिक शब्द कहे थे जो आज भी हर भारतीय के खून में उबाल ला देते हैं: “मेरे शरीर पर पड़ी लाठी का हर प्रहार, ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत की आखिरी कील साबित होगा.”
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लाठीचार्ज की उन चोटों ने लाला जी के शरीर को बहुत कमजोर कर दिया था. वे उन घावों से उबर नहीं पाए और 17 नवंबर 1928 को उन्होंने आखिरी सांस ली. उनके निधन की खबर ने पूरे देश में गुस्से की आग लगा दी. इसी बलिदान का बदला लेने के लिए बाद में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने सांडर्स को ठिकाने लगाया था.
बता दें कि लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी 1865 को पंजाब के धुदिके गांव में हुआ था. उनके पिता एक शिक्षक थे, शायद यही वजह थी कि लाला जी भी एक महान लेखक और वक्ता बने. उन्होंने न केवल अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी, बल्कि समाज सुधार और शिक्षा के क्षेत्र में भी बड़ा योगदान दिया. आज भले ही वो हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी निडरता और ‘नागपाश’ जैसी ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ उनकी आवाज आज भी हर हिंदुस्तानी को प्रेरित करती है.
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-भारत एक्सप्रेस
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