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12 साल, 4 शिक्षा मंत्री: उपलब्धि, फैसले और विवाद… जानें मोदी सरकार के शिक्षा मंत्रालय का पूरा रिपोर्ट कार्ड

Modi Government Education Ministers: केंद्र सरकार में बड़ा प्रशासनिक बदलाव देखने को मिला है. शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद यह जिम्मेदारी प्रह्लाद जोशी को सौंप दी गई. दिलचस्प बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के 12 वर्षों के दौरान शिक्षा मंत्रालय की कमान अब तक चार अलग-अलग नेताओं के हाथों में रही, लेकिन इनमें से कोई भी पूरा पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सका.

हर शिक्षा मंत्री अपने साथ कुछ नई योजनाएं और बड़े फैसले लेकर आया, लेकिन कई बार विवादों और चुनौतियों ने भी उनके कार्यकाल को प्रभावित किया. आइए जानते हैं कि इन चारों मंत्रियों के कार्यकाल की प्रमुख उपलब्धियां और चर्चित घटनाएं क्या रहीं.

स्मृति ईरानी: बड़े फैसलों के साथ विवाद भी

जब मई 2014 में पहली बार नरेंद्र मोदी सरकार बनी, तब शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी स्मृति ईरानी (Smriti Irani) को दी गई. पद संभालते ही उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम को समाप्त करने का फैसला लिया. सरकार का तर्क था कि इस व्यवस्था को लागू करते समय आवश्यक नियमों और प्रक्रियाओं का पूरी तरह पालन नहीं किया गया था. उस समय कई छात्र संगठन भी इस पाठ्यक्रम का विरोध कर रहे थे और उनका कहना था कि विश्वविद्यालय इसके लिए पूरी तरह तैयार नहीं था.

स्मृति ईरानी के कार्यकाल में नई शिक्षा नीति की रूपरेखा तैयार करने का काम शुरू हुआ, जिसे बाद में आगे बढ़ाया गया. इसी दौरान नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क (NIRF) की शुरुआत भी हुई, जिसके जरिए देश के उच्च शिक्षण संस्थानों की रैंकिंग तय की जाने लगी.

हालांकि उनका कार्यकाल पूरी तरह विवादों से मुक्त नहीं रहा. जेएनयू में हुए छात्र आंदोलन, कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी और हैदराबाद विश्वविद्यालय के शोध छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या जैसे मामलों को लेकर विपक्ष ने सरकार और शिक्षा मंत्रालय पर लगातार सवाल उठाए. आखिरकार जुलाई 2016 में उनका मंत्रालय बदलकर उन्हें कपड़ा मंत्रालय की जिम्मेदारी दे दी गई.

प्रकाश जावड़ेकर: संस्थागत सुधारों पर रहा जोर

स्मृति ईरानी के बाद जुलाई 2016 में प्रकाश जावड़ेकर (Prakash Javadekar) ने शिक्षा मंत्रालय की कमान संभाली. उनके कार्यकाल में उच्च शिक्षा क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गए. सबसे अहम कदमों में भारतीय प्रबंधन संस्थानों (IIM) को ‘इंस्टीट्यूशन ऑफ नेशनल इम्पोर्टेंस’ का दर्जा देना शामिल था. इससे इन संस्थानों को प्रशासनिक और शैक्षणिक फैसलों में पहले से अधिक स्वायत्तता मिली.

इसी दौरान नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की स्थापना भी हुई. सरकार का उद्देश्य था कि देश की प्रमुख प्रवेश परीक्षाएं एक ही एजेंसी के माध्यम से आयोजित हों, जिससे पारदर्शिता और बेहतर समन्वय सुनिश्चित किया जा सके. स्कूली शिक्षा में भी बदलाव किए गए. ‘नो डिटेंशन पॉलिसी’ में संशोधन करते हुए राज्यों को यह अधिकार दिया गया कि वे पांचवीं से आठवीं कक्षा तक छात्रों को फेल करने या न करने पर स्वयं फैसला ले सकें.

हालांकि उनके कार्यकाल में सीबीएसई बोर्ड परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने की घटना ने सरकार को आलोचनाओं का सामना भी कराया. 2019 में नई सरकार बनने के बाद उन्हें पर्यावरण और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी दे दी गई.

रमेश पोखरियाल निशंक: नई शिक्षा नीति का ऐतिहासिक दौर

मई 2019 में रमेश पोखरियाल निशंक (Ramesh Pokhriyal Nishank) ने शिक्षा मंत्रालय संभाला. उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) की घोषणा मानी जाती है. इस नीति को देश की शिक्षा व्यवस्था में लंबे समय बाद हुए सबसे बड़े सुधारों में गिना जाता है.

हालांकि नीति घोषित होने के बाद इसके क्रियान्वयन की रफ्तार को लेकर सवाल भी उठे. कई विशेषज्ञों का मानना था कि जमीनी स्तर पर बदलाव अपेक्षित गति से नहीं हो पाए. इसी दौरान शिक्षा मंत्रालय के कई महत्वपूर्ण पद लंबे समय तक खाली रहे और देश के कुछ प्रमुख आईआईटी संस्थानों में निदेशकों की नियुक्ति भी लंबित रही. कोरोना महामारी के दौरान रमेश पोखरियाल स्वयं संक्रमित हो गए और लंबे समय तक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझते रहे. आखिरकार जुलाई 2021 में उन्होंने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया.


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धर्मेंद्र प्रधान: सबसे लंबा कार्यकाल, लेकिन अंत विवादों के बीच

जुलाई 2021 में धर्मेंद्र प्रधान (Dharmendra Pradhan) ने शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली. लगभग पांच वर्षों तक इस पद पर रहने के साथ वे मोदी सरकार के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले शिक्षा मंत्री बने. उनके कार्यकाल में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को तेजी से लागू करने पर विशेष जोर दिया गया. मातृभाषा में शिक्षा को बढ़ावा देने, स्कूलों के आधुनिकीकरण और पीएम-श्री (PM-SHRI) योजना जैसी पहलों को आगे बढ़ाने के लिए भी उनके कार्यकाल को याद किया जाएगा.

लेकिन दूसरी ओर, विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक के आरोप और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल लगातार सरकार के लिए चुनौती बने रहे. परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को लेकर विपक्ष और छात्रों ने कई बार विरोध प्रदर्शन किए.

आखिरकार 25 जुलाई 2026 को जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शनों के बीच धर्मेंद्र प्रधान ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद सरकार ने शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी प्रह्लाद जोशी को सौंप दी. अब सबकी नजर इस बात पर है कि नए शिक्षा मंत्री आने वाले समय में शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियों का किस तरह सामना करते हैं और नई शिक्षा नीति के अधूरे लक्ष्यों को किस गति से आगे बढ़ाते हैं.

-भारत एक्सप्रेस 

Sahil Singh

पढ़ने-लिखने से शुरू हुआ सफर खबरों तक ले गया. पत्रकारिता को करियर बनाने का एक मात्र उद्देश्य—पढ़ना, साथ ही नई-नई चीज़ों को जानने की जिज्ञासा रखना था. आज से पहले ‘आज तक’ चैनल, उसके बाद दायित्व वेबसाइट, और अब भारत एक्सप्रेस में बतौर सब-एडिटर की भूमिका निभा रहा हूं.

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