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GFR Reform: शोधकर्ताओं की मुश्किलें हुई कम, मोदी सरकार ने आसान किए रिसर्च से जुड़े नियम

GFR Reform: भारत के वैज्ञानिकों के लिए अच्छी खबर है. सरकार ने रिसर्च से जुड़ी चीजें खरीदने के नियमों को आसान कर दिया है. पहले वैज्ञानिकों को किसी भी मशीन या उपकरण की खरीद के लिए बहुत लंबी और जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था, जिससे उनके प्रोजेक्ट्स में देरी होती थी. लेकिन अब जनरल फाइनेंशियल रूल्स (GFR) में बदलाव कर सरकार ने इस परेशानी को काफी हद तक कम कर दिया है.

IIT कानपुर के प्रोफेसर अमिताभ बंद्योपाध्याय की लैब में रखी तीन मशीनें इस समस्या की कहानी बयां करती हैं. एक 16 साल पुरानी जर्मन माइक्रोटोम मशीन आज भी ठीक से काम कर रही है. लेकिन दो नई भारतीय मशीनें जो हाल ही में खरीदी गई थीं, वो खराब हो चुकी हैं. इन पर करीब 15 लाख रुपये खर्च किए गए थे. इससे समझ आता है कि सिर्फ ‘सस्ती’ चीजें खरीदना ही समाधान नहीं है.

ऐसी दिक्कतों का करना पड़ता है सामना

दरअसल, सरकारी खरीद में एक नियम होता है कि ब्रांड का नाम नहीं लिया जा सकता, बल्कि तकनीकी गुण बताए जाने चाहिएं. ऐसे में कंपनियां सस्ते में कम गुणवत्ता वाली मशीनें बेच देती हैं और वैज्ञानिक मजबूरी में वही खरीदते हैं.

IIIT दिल्ली के प्रोफेसर प्रवेश बियानी बताते हैं कि टेंडर की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि कई बार शोधकर्ता वो चीज भी नहीं खरीद पाते जो उन्हें सच में चाहिए होती है. और जब खरीदते हैं तो उसमें भी कई महीनों का समय लग जाता है.

बजट भी है बड़ी समस्या

एक और समस्या है बजट का. रिसर्च के लिए मिलने वाला पैसा अगर 31 मार्च तक खर्च नहीं हुआ, तो वो वापस चला जाता है. इससे अगले साल की फंडिंग भी खतरे में पड़ जाती है.

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विदेश से सामान मंगाने में लग जाते हैं 4 महीने

IISc बेंगलुरु के एक शोधकर्ता दिग्विजय प्रताप सिंह का कहना है कि अगर किसी मशीन की कीमत 5 लाख से ज्यादा है तो ‘स्थानीय सामग्री प्रमाण पत्र’ देना जरूरी है. लेकिन भारत में अभी भी कई तकनीकें नहीं बनतीं, खासकर एयरोस्पेस जैसे क्षेत्रों में. ऐसे में विदेशी मशीन खरीदने के लिए ग्लोबल टेंडर देना पड़ता है, जिसमें 3 से 4 महीने लग जाते हैं. कई वैज्ञानिक सिस्टम को चकमा देने के लिए ‘जुगाड़’ करते हैं जैसे किसी एक्सेसरी को जोड़कर खरीदना ताकि लोकल कंटेंट की शर्त पूरी हो जाए.

अब सरकार ने GFR के नियमों को लचीला बनाया है. इससे वैज्ञानिकों को जरूरी सामान खरीदने में कम अड़चन आएगी और रिसर्च तेजी से आगे बढ़ सकेगी. ये बदलाव न सिर्फ वैज्ञानिकों का समय बचाएगा, बल्कि देश की रिसर्च गुणवत्ता को भी बढ़ावा देगा.

– भारत एक्सप्रेस

Govind Kumar Singh

मैं गोविंद सिंह हूं और मूल रूप से बिहार के कैमूर की पहाड़ियों वाले इलाके से आता हूं। मेरी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई वाराणसी के उदय प्रताप कॉलेज से हुई। इसके बाद मैंने पटना कॉलेज, पटना से मास कम्यूनिकेशन में ग्रेजुएशन किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने करियर की शुरुआत की और अलग-अलग संस्थानों में काम करते हुए खबरों की दुनिया को करीब से समझा। अपने पेशेवर सफर में मुझे ईटीवी भारत, इनशॉर्ट्स और श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन जैसे संस्थानों के साथ काम करने का अवसर मिला। इन जगहों पर काम करते हुए मैंने रिपोर्टिंग, कंटेंट लेखन, रिसर्च और समाचारों की प्रस्तुति से जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातें सीखीं। फिलहाल मैं भारत एक्सप्रेस में सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हूं। यहां मेरी मुख्य रुचि विदेश, राजनीति और बिहार से जुड़ी खबरों को कवर करने में है।

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