फोटो: मोरारजी देसाई और इंदिरा गांधी
Morarji Desai Biography: भारतीय राजनीति के इतिहास में मोरारजी देसाई एक ऐसी शख्सियत रहे, जिन्होंने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया. 1977 का साल देश के लिए एक नई सुबह लेकर आया था. आपातकाल के काले साये के बाद जब चुनाव हुए, तो इंदिरा गांधी की सत्ता उखड़ गई और देश को मोरारजी देसाई के रूप में अपना पहला गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री मिला. एक सख्त गांधीवादी और अपनी ईमानदारी के लिए मशहूर देसाई का सफर सरकारी नौकरी से शुरू होकर देश के सर्वोच्च पद तक पहुँचा, लेकिन यह रास्ता कांटों भरा था.
29 फरवरी 1896 को गुजरात में जन्मे मोरारजी देसाई के अंदर देशप्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी थी. 1930 में जब महात्मा गांधी ने आजादी का बिगुल फूंका, तो देसाई ने ब्रिटिश न्याय व्यवस्था से भरोसा टूटने के बाद अपनी सुरक्षित सरकारी नौकरी को लात मार दी. उन्होंने माना कि परिवार की समस्याएं देश की आजादी के सामने छोटी हैं. इस संघर्ष के दौरान उन्हें तीन बार जेल की सलाखें देखनी पड़ीं, लेकिन उनके कदम कभी पीछे नहीं हटे.
स्वतंत्रता के बाद मोरारजी देसाई ने प्रशासनिक सुधारों की झड़ी लगा दी. 1952 में जब वे बंबई (अब मुंबई) के मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने ‘हलवाहा के लिए भूमि’ जैसे प्रगतिशील कानून लागू किए. उनका मानना था कि जब तक गांव के गरीब का जीवन नहीं सुधरेगा, तब तक समाजवाद बेमानी है. 1956 में वे दिल्ली आए और वाणिज्य, उद्योग व वित्त जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली. उनके कार्यकाल में वित्तीय अनुशासन और सरकारी खर्च में मितव्ययिता उनकी पहचान बनी.
1967 में मोरारजी देसाई इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में उप-प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के रूप में शामिल हुए. हालांकि, जल्द ही दोनों के बीच वैचारिक मतभेद गहराने लगे. जुलाई 1969 में जब इंदिरा गांधी ने उनसे बिना सलाह किए वित्त मंत्रालय का प्रभार वापस ले लिया, तो देसाई के आत्म-सम्मान को गहरी चोट पहुँची. उन्होंने इसे ‘शिष्टाचार का अभाव’ माना और तुरंत उप-प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने साबित कर दिया कि उनके लिए पद से बड़ा स्वाभिमान है.
मोरारजी देसाई ने कभी प्रधानमंत्री बनने की अपनी इच्छा को छिपाया नहीं. नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद भी उन्होंने कोशिश की, लेकिन सफलता 1977 में मिली. आपातकाल के बाद हुए चुनावों में जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत हुई और 24 मार्च 1977 को मोरारजी देसाई ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. वे मानते थे कि प्रधानमंत्री भी कानून से ऊपर नहीं है और जनता को इतना निडर होना चाहिए कि वह सत्ता की गलती पर उंगली उठा सके.
जनता पार्टी की सरकार में आंतरिक कलह के कारण उन्हें 28 जुलाई 1979 को इस्तीफा देना पड़ा. इसके बाद 83 वर्ष की आयु में उन्होंने सक्रिय राजनीति को अलविदा कह दिया. सिद्धांतों के धनी मोरारजी देसाई का 10 अप्रैल 1995 को 99 वर्ष की आयु में निधन हो गया. वे आज भी भारतीय राजनीति में अटूट संकल्प और गांधीवादी मूल्यों के प्रतीक माने जाते हैं.
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