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प्रधानमंत्री मोदी ने कहा- फैसले और कानूनी दस्तावेज़ स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध कराए जाएं, कानूनी सहायता सिस्टम से 3 सालों में 8 लाख मामले सुलझाए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार (8 नवंबर) को कहा कि जब न्याय सभी के लिए सुलभ होता है, समय पर मिलता है और हर व्यक्ति तक पहुंचता है, चाहे उसका सामाजिक या आर्थिक बैकग्राउंड कुछ भी हो, तभी वह सही मायने में सामाजिक न्याय की नींव बनता है.

‘कानूनी सहायता वितरण तंत्र को मजबूत करने’ और ‘कानूनी सेवा दिवस’ के मौके पर राष्ट्रीय सम्मेलन में अपने उद्घाटन भाषण में उन्होंने कहा कि व्यापार करने में आसानी और जीवन जीने में आसानी तभी सच में संभव है जब न्याय में भी आसानी सुनिश्चित हो.

पीएम मोदी ने बताया कि हाल के सालों में न्याय में आसानी बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए गए हैं और आगे भी सरकार इस दिशा में कोशिशें तेज करेगी. उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि ऐसी पहुंच सुनिश्चित करने में कानूनी सहायता अहम भूमिका निभाती है. पीएम मोदी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि राष्ट्रीय स्तर से लेकर तालुका स्तर तक, कानूनी सेवा प्राधिकरण न्यायपालिका और आम नागरिक के बीच एक पुल का काम करते हैं.

तीन सालों में लगभग 8 लाख मामले सुलझाए गए

भारत सरकार द्वारा शुरू की गई कानूनी सहायता रक्षा वकील प्रणाली के तहत, सिर्फ तीन सालों में लगभग 8 लाख आपराधिक मामले सुलझाए गए हैं. उन्होंने कहा कि इन कोशिशों से देश भर में गरीब, पीड़ित, वंचित और हाशिए पर पड़े लोगों के लिए न्याय में आसानी सुनिश्चित हुई है.

प्रधानमंत्री मोदी ने इस कार्यक्रम में सामुदायिक मध्यस्थता प्रशिक्षण मॉड्यूल भी लॉन्च किया. उन्होंने कहा कि आज टेक्नोलॉजी समावेश और सशक्तिकरण के लिए एक शक्तिशाली माध्यम के रूप में उभर रही है; न्याय वितरण में ई-कोर्ट्स प्रोजेक्ट इस बदलाव का एक बेहतरीन उदाहरण है.

पीएम मोदी ने कहा,


जब लोग कानून को अपनी भाषा में समझते हैं, तो इससे बेहतर पालन होता है और मुकदमेबाजी कम होती है; यह भी उतना ही ज़रूरी है कि फैसले और कानूनी दस्तावेज़ स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध कराए जाएं.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने फैसलों को 18 भाषाओं में अनुवाद करने के कदम की सराहना करते हुए उन्होंने यह बात कही. कानूनी जागरूकता के महत्व पर ज़ोर देते हुए, प्रधानमंत्री ने कहा कि एक गरीब व्यक्ति तब तक न्याय तक नहीं पहुंच सकता जब तक उसे अपने अधिकारों की जानकारी न हो, वह कानून को न समझे और सिस्टम की जटिलता के डर से बाहर न निकले. उन्होंने पुष्टि की कि कमज़ोर समूहों, महिलाओं और बुजुर्गों के बीच कानूनी जागरूकता बढ़ाना प्राथमिकता है.


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-भारत एक्सप्रेस 

Md Shadan Ayaz

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