SIFOCC 6th Full Meeting: भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बी.आर. गवई ने आज स्टैंडिंग इंटरेशनल फोरम ऑफ कॉमर्शियल कोर्ट्स (SIFOCC) के 6ठे पूर्ण सत्र में हिस्सा लिया. यहां उन्होंने “व्यावसायिक कानून और भारत के संविधान की 75वीं वर्षगांठ” विषय पर संबोधन दिया. दिल्ली हाई कोर्ट परिसर में आयोजित इस सम्मेलन में केंद्रीय कानून एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल, जस्टिस मनमोहन, जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय, जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह, हांगकांग कोर्ट ऑफ फाइनल अपील के जस्टिस जोसेफ फोक सहित विभिन्न देशों के मुख्य न्यायाधीशों, न्यायाधीशों और प्रतिनिधियों ने भाग लिया.
संविधान की नींव और व्यावसायिक अधिकार
जस्टिस बी.आर. गवई ने अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए कहा, “यह सम्मेलन वैश्विक आर्थिक सहयोग की मजबूत नींव के रूप में कानून के शासन और व्यावसायिक प्रणालियों की स्थिरता में हमारे साझा विश्वास को दर्शाता है. भारत में इसकी मेजबानी संविधान की 75वीं वर्षगांठ के वर्ष में विशेष रूप से सार्थक है, जो हमारी लोकतंत्र और विकसित होती व्यावसायिक न्यायशास्त्र का मार्गदर्शन करता रहा है.” उन्होंने संविधान सभा की ऐतिहासिक चुनौती को याद किया, जब नवस्वतंत्र भारत के लिए स्थिर कानूनी ढांचा बनाया गया.
मुख्य न्यायाधीश बोले, “राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं यदि आर्थिक अवसर, निष्पक्षता और विकास साथ न हो. संविधान के भाग-III में अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत व्यवसाय करने का मौलिक अधिकार दिया गया, जबकि भाग-IV के नीति निदेशक तत्वों में सामाजिक-आर्थिक न्याय सुनिश्चित किया गया. अनुच्छेद 14 राज्य की मनमानी रोकता है और भाग-XIII ने भारत को मजबूत आर्थिक इकाई बनाया.”
1991 से पहले, नियंत्रण-आधारित अर्थव्यवस्था
मुख्य न्यायाधीश ने व्यावसायिक कानून के विकास को दो चरणों में विभाजित किया. उन्होंने कहा, “1991 से पहले कमांड-एंड-कंट्रोल मॉडल, जहां राज्य नियोजन और विनियमन में केंद्रीय था. कंपनी अधिनियम 1956, एमआरटीपी अधिनियम 1969 जैसे कानूनों ने कॉर्पोरेट गवर्नेंस और एकाधिकार रोकथाम सुनिश्चित की. भूमि सुधारों से केशवानंद भारती (1973) जैसे ऐतिहासिक फैसले निकले.”
1991 के बाद उदारीकरण और वैश्वीकरण
मुख्य न्यायाधीश बोले, “1991 के बाद उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण का दौर आया. सेबी अधिनियम 1992 ने पारदर्शी पूंजी बाजार स्थापित किया. मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम 1996 (2015, 2019, 2021 संशोधनों सहित) ने विवाद समाधान को मजबूत बनाया. प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 ने सीसीआई गठित कर नवोन्मेष और उपभोक्ता कल्याण पर जोर दिया. एमएसएमईडी अधिनियम 2006 ने छोटे उद्यमों को सशक्त किया. कंपनी अधिनियम 2013 ने सीएसआर अनिवार्य किया और महिला निदेशक की बाध्यता लाई. व्यावसायिक न्यायालय अधिनियम 2015 ने विशेष अदालतें स्थापित कीं, जबकि दिवाला एवं दिवालियापन संहिता 2016 ने समयबद्ध समाधान सुनिश्चित किया.”
न्यायपालिका की संतुलित भूमिका: सीजेआई
जस्टिस बी.आर. गवई ने न्यायपालिका की भूमिका पर जोर दिया. उन्होंने कहा, “सुप्रीम कोर्ट नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता जब तक मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न हो. आर.के. गर्ग, बाल्को, वोडाफोन जैसे फैसलों में आर्थिक स्वतंत्रता, विनियामक अनुशासन और निष्पक्षता का संतुलन बनाया. देवास मल्टीमीडिया, एसबीआई बनाम मुरारी लाल जलान जैसे मामलों में पारदर्शिता और समयबद्धता सुनिश्चित की.”
भविष्य की ओर देखते हुए उन्होंने कहा, “डिजिटल और हरित अर्थव्यवस्था में ईएसजी मानक अनुच्छेद 48ए और ट्रस्टीशिप की भावना से मेल खाते हैं. फिनटेक, ब्लॉकचेन, एआई नई चुनौतियां ला रहे हैं. डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 प्रारंभिक कदम है. गोपनीयता, एल्गोरिदम पारदर्शिता, जलवायु वित्त और सप्लाई चेन मजबूती आगामी फोकस होंगे.”
कार्यक्रम का समापन और CJI का संकल्प
अपने संबोधन के अंत में मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “आर्थिक विकास मानव कल्याण की सेवा करे. कानून विश्वास का ढांचा बने. पारदर्शी नियामक, स्वतंत्र ट्रिब्यूनल और कुशल अदालतें आवश्यक. 75वीं वर्षगांठ गर्व और संकल्प का अवसर है. यह सम्मेलन भारतीय न्यायशास्त्र को आगे बढ़ाएगा.”
सीजेआई का संबोधन भारत की संवैधानिक नींव पर व्यावसायिक कानून की यात्रा को रेखांकित करता है, जो वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति को मजबूत करता है. सम्मेलन में दो दिवसीय विचार-विमर्श से व्यावसायिक न्याय प्रणाली में सुधार की उम्मीद है.
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.


