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एक IPS जिसे सौंपी गई थी पूर्व प्रधानमंत्री को गिरफ्तार करने की जिम्मेदारी

बीते 7 अक्टूबर को भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के दिग्गज अधिकारी, निर्मल कुमार सिंह (एनके सिंह) का निधन हो गया. वे 1961 बैच के आईपीएस (ओडिशा कैडर) अधिकारी थे. बिहार के मधेपुरा जिले में जन्मे एन.के सिंह ने अपनी पूरी जिंदगी अनुशासन, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के सिद्धांतों पर जिया. राजनीतिक दबावों के बावजूद सच्चाई का साथ नहीं छोड़ा, जिसकी वजह से उन्हें व्यक्तिगत और पेशेवर दोनों स्तरों पर भारी कीमत चुकानी पड़ी. उनकी कहानी न केवल पुलिस सेवा की चुनौतियों को उजागर करती है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में ईमानदार अधिकारियों की भूमिका को भी रेखांकित करती है. उनकी किताब The Plain Truth (हिंदी में ‘खरा सत्य’ ) उनके जीवन के उतार-चढ़ावों का जीवंत चित्रण हैं, जो राजनीतिक हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी लड़ाई को दर्शाती हैं.

सबसे बड़ी चुनौती

एन.के सिंह का प्रारंभिक जीवन बिहार के ग्रामीण इलाके में बीता, जहां उनके परिवार की स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी ने उन्हें नैतिक मूल्यों से जोड़ा. राजनीति विज्ञान में शिक्षा प्राप्त करने के बाद कुछ समय तक रांची विश्वविद्यालय में अध्यापन किया. भारतीय पुलिस सेवा में शामिल होने के बाद उनकी पहली नियुक्ति सीबीआई में 1972 से 1980 तक रही, जो उनके करियर का सबसे चुनौतीपूर्ण दौर था. 1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी सरकार ने उन्हें एक ऐतिहासिक जिम्मेदारी सौंपी. उस समय जीप खरीद घोटाले में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी होनी थी. कई अधिकारी इससे पीछे हट रहे थे, लेकिन एन.के सिंह ने बिना हिचकिचाहट के यह दायित्व स्वीकार किया.

पूर्व प्रधानमंत्री की गिरफ्तारी

3 अक्टूबर 1977 को एन.के सिंह ने सीबीआई के संयुक्त निदेशक वी.आर. लक्ष्मीनारायणन के निर्देश पर इंदिरा गांधी को गिरफ्तार किया. मामला चुनावी उद्देश्यों के लिए जीपों की खरीद में पद का दुरुपयोग करने का था. गिरफ्तारी की प्रक्रिया काफी नाटकीय रही. इंदिरा गांधी ने जमानत लेने से इनकार कर दिया और हथकड़ी लगाने की मांग की. उनके समर्थकों ने भीड़ जुटाई, जिससे स्थिति तनावपूर्ण हो गई. सिंह ने दृढ़ता से स्थिति संभाली और गांधी को हरियाणा ले जाने की योजना बनाई, लेकिन रेलवे क्रॉसिंग पर रुकावट के कारण उन्हें दिल्ली के किंग्सवे कैंप पुलिस लाइंस में रखा गया. अगले दिन अदालत में पेशी के दौरान भगदड़ मच गई. अंततः श्रीमती गांधी को रिहा कर दिया गया. इस घटना ने एन.के सिंह को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित बना दिया, लेकिन यह उनके लिए मुसीबतों की शुरुआत भी थी.

ईमानदारी की कीमत

इसके अलावा, एनके. सिंह ने ‘किस्सा कुर्सी का’ फिल्म से जुड़े मामलों में संजय गांधी और विद्याचरण शुक्ला की जांच की. यह फिल्म आपातकाल के दौरान राजनीतिक सेंसरशिप का प्रतीक थी, और सिंह की जांच ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी. उन्होंने शुगर डील और अन्य भ्रष्टाचार के मामलों में भी सक्रिय भूमिका निभाई. लेकिन ईमानदारी की कीमत उन्हें भारी पड़ी. 1980 में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी के बाद सिंह को सीबीआई से हटा दिया गया. झूठे मामलों में फंसाया गया, गिरफ्तार किया गया और बार-बार तबादले किए गए. सबसे दर्दनाक घटना उनके बड़े बेटे दिलीप की एक रहस्यमयी सड़क दुघर्टना में मौत थी. दिलीप ने आईआईटी प्रवेश परीक्षा पास की थी. सिंह का मानना था कि यह हादसा नहीं, बल्कि सुनियोजित हत्या थी, जो इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी का बदला था. यहां तक कि उनकी खुद की हत्या की साजिश रची गई. इन घटनाओं ने सिंह को तोड़ने की कोशिश की, लेकिन वे अडिग रहे.

सीबीआई में वापसी

1989 में वी.पी सिंह के प्रधानमंत्री बनने पर, एन.के सिंह को दोबारा सीबीआई में लाया गया. वे संयुक्त निदेशक बने और स्पेशल इन्वेस्टिगेशन ग्रुप की जिम्मेदारी संभाली. इस दौरान उन्होंने सेंट किट्स फोर्जरी केस, एयरबस-320 डील और फोन टैपिंग जैसे संवेदनशील मामलों की जांच की. सेंट किट्स केस में वी.पी सिंह के बेटे अजय सिंह को फंसाने की साजिश का खुलासा हुआ. लेकिन 1991 में चंद्रशेखर सरकार आने पर फिर से उनका तबादला कर दिया गया. बाद में, वे बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (BSF) में अतिरिक्त महानिदेशक (ADG) बने और फिर ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट (BPRD) के महानिदेशक (DG) की जिम्मेदारी संभाली. इन पदों पर भी उन्होंने ईमानदारी से काम किया, पुलिस सुधारों और अनुसंधान में योगदान दिया.

दुर्लभ अधिकारी

लोकसभा के पूर्व स्पीकर रवि राय ने एक बातचीत में उन्हें सबसे ईमानदार आईपीएस अधिकारी बताया था. राय के शब्दों में, सिंह जैसे अधिकारी दुर्लभ हैं, जो राजनीतिक दबावों से ऊपर उठकर काम करते हैं. एन.के सिंह ने संस्मरण में इन अनुभवों का विस्तार से वर्णन किया है. ‘खरा सत्य’ में वे राजनीतिक हस्तक्षेप, भ्रष्टाचार और लोकतंत्र की चुनौतियों पर चर्चा करते हैं. संस्मरण से पता चलता है कि कैसे राजनीतिज्ञों ने जांच एजेंसियों को प्रभावित किया और ईमानदार अधिकारियों को दंडित किया.

एन.के सिंह का जीवन हमें सिखाता है कि सच्चाई का रास्ता कठिन होता है, लेकिन वह अमर रहता है. उन्होंने कभी समझौता नहीं किया, भले ही परिवार को दुख सहना पड़ा. आज, जब पुलिस सेवा में राजनीतिक हस्तक्षेप की बहस चल रही है, उनकी कहानी प्रेरणा का स्रोत है. उनकी विरासत ईमानदार अधिकारियों को आगे बढ़ने की शक्ति देगी.

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-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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