TMC Political Crisis: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस समय अपने इतिहास के सबसे भीषण राजनीतिक अस्तित्व के संकट से गुजर रही है. कोलकाता की सत्ता पर भाजपा के काबिज होने और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के कार्यभार संभालने के बाद, ममता बनर्जी का ‘किला’ ताश के पत्तों की तरह ढहता नजर आ रहा है. राज्य में विधानसभा विंग पर नियंत्रण खोने के बाद अब यह आग दिल्ली तक पहुंच गई है. देश की राजधानी में एक ऐसा सियासी भूचाल आया है जिसने ममता बनर्जी के राष्ट्रीय राजनीतिक कद को हिलाकर रख दिया है.
लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के कुल 28 सांसद हैं. इनमें से पूरे 20 बागी सांसद एकजुट होकर पाला बदलने और संसद में अलग गुट बनाने की तैयारी कर चुके हैं. पूर्व टीएमसी नेता और बागी गुट की अगुवाई कर रही काकोली घोष दस्तीदार ने बड़ा दावा किया है कि सभी 20 सांसदों के हस्ताक्षर वाला पत्र लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंप दिया गया है, जिसमें सदन के भीतर बैठने के लिए अलग व्यवस्था करने की मांग की गई है.
दलबदल विरोधी कानून के तहत बिना सांसदी गंवाए किसी भी दल में कानूनी रूप से विभाजन को मान्यता देने के लिए दो-तिहाई सांसदों का एक साथ टूटना जरूरी है. टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों के लिहाज से यह जादुई आंकड़ा 19 बैठता है, जबकि बागी खेमे के पास 20 सांसदों का मजबूत समर्थन है.
यदि लोकसभा स्पीकर ओम बिरला इस अलग गुट को मान्यता दे देते हैं, तो संसद में ममता बनर्जी की पार्टी से ‘तीसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी’ का तमगा छिन जाएगा. इसके साथ ही, यह बागी गुट केंद्र में सत्तारूढ़ एनडीए (NDA) को समर्थन देने की तैयारी में है, जिससे भाजपा की अपने अन्य सहयोगियों पर निर्भरता काफी कम हो जाएगी.
इस बगावत को हवा देने में पश्चिम बंगाल विधानसभा के भीतर हुआ ‘साइन-गेट’ कांड (फर्जी हस्ताक्षर मामला) सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ है. दरअसल, बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने आरोप लगाया था कि टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने नेता प्रतिपक्ष के चयन के लिए विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर वाले पत्र सौंपे थे.
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इसी मामले में घिरे अभिषेक बनर्जी की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं. राज्य की सीआईडी (CID) ने उन्हें तीसरा सख्त नोटिस जारी कर आज शाम 5 बजे भवानी भवन मुख्यालय में पूछताछ के लिए उपस्थित होने का कड़ा अल्टीमेटम दिया है. इससे पहले वे स्वास्थ्य कारणों और अदालती सुरक्षा का हवाला देकर दो समन टाल चुके हैं.
बागी विधायक और सांसदों की अगली रणनीति सिर्फ संसद तक सीमित नहीं है. सूत्रों के मुताबिक, बागी गुट बहुत जल्द केंद्रीय चुनाव आयोग (ECI) का दरवाजा खटखटाने जा रहा है, जहां वे खुद को ‘असली तृणमूल कांग्रेस’ बताते हुए पार्टी के आधिकारिक चुनाव चिह्न और नाम पर अपना दावा ठोकेंगे. इसके साथ ही, बागियों द्वारा एक बड़ा कूटनीतिक दांव खेलते हुए टीएमसी के मौजूदा बैंक खातों और ‘पार्टी फंड’ को तुरंत प्रभाव से सीज (फ्रीज) करने की कानूनी मांग की जा रही है. विधानसभा चुनाव के बाद चारों तरफ से घिर चुकी ममता बनर्जी के लिए यह सांगठनिक और वित्तीय नाकेबंदी राजनीतिक रूप से सबसे दर्दनाक साबित होने वाली है.
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