Women Reservation Bill 2026: भारत की सियासत में ‘नारी शक्ति’ को उसका असली हक दिलाने की राह अभी भी आसान नहीं दिख रही है. 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले महिलाओं के लिए 33% आरक्षण और परिसीमन की प्रक्रिया को अमली जामा पहनाने के लिए आज संसद का विशेष सत्र बुलाया गया है. आज सदन पटल पर एक साथ तीन-तीन ऐतिहासिक विधेयक पेश किए जाने वाले हैं, जिनमें ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ और ‘परिसीमन आयोग गठन’ सबसे अहम हैं.
सरकार के इन बड़े इरादों के बीच जो सबसे बड़ी दीवार खड़ी है, वह है संसद का ‘नंबर गेम’. बहुमत के जादुई आंकड़े से दूर खड़ी एनडीए (NDA) सरकार इन बिलों को आखिर कैसे पास कराएगी?
संसद में पेश होने वाले परिसीमन विधेयक को छोड़ दें, तो अन्य दो विधेयक ‘संविधान संशोधन विधेयक’ हैं. तकनीकी रूप से इन्हें पारित करने के लिए संसद में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई (2/3) बहुमत की सख्त आवश्यकता होगी.
लोकसभा का गणित: लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत का जादुई आंकड़ा 360 है. सत्ताधारी NDA के पास वर्तमान में 293 सदस्य हैं. यानी बिल पास कराने के लिए सरकार को अभी भी 67 अतिरिक्त वोटों की जरूरत है.
राज्यसभा का गणित: उच्च सदन में दो-तिहाई बहुमत के लिए 163 वोटों की जरूरत है, जबकि NDA की वर्तमान ताकत 142 के आसपास है. यहां भी सरकार बहुमत के आंकड़े से 21 सीट दूर खड़ी है.
ऐसी स्थिति में यदि विपक्ष ‘वॉकआउट’ कर देता है, तो उपस्थित सदस्यों की संख्या कम हो जाएगी, जिससे बहुमत का आंकड़ा भी गिर सकता है और सरकार के लिए बिल पास कराना आसान हो सकता है.
केंद्र सरकार 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन करने और महिला आरक्षण लागू करने की योजना बना रही है. प्रस्तावित विधेयकों के तहत, परिसीमन के बाद लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़कर सीधे 850 (राज्यों से 815 और केंद्र शासित प्रदेशों से 35) तक हो सकती है. सरकार का लक्ष्य है कि इसी परिसीमन के साथ-साथ महिलाओं के लिए 33% कोटा भी निर्धारित कर दिया जाए.
विपक्ष का साफ कहना है कि वे महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन इसे परिसीमन और 2029 के चुनावों से जोड़ने का वे कड़ा विरोध करेंगे. विपक्ष का तर्क है कि 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का पुनर्निर्धारण केवल NDA को राजनीतिक लाभ पहुंचाएगा. सबसे बड़ा डर दक्षिण भारतीय राज्यों (जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा काम किया है) को है, जिनकी संसदीय शक्ति उत्तर भारत के राज्यों के मुकाबले कम हो जाएगी और वे हाशिए पर धकेल दिए जाएंगे.
मुश्किलें सिर्फ विपक्ष तक सीमित नहीं हैं. क्षेत्रीय दल जैसे BJD और BRS, जो अतीत में कई मुद्दों पर सरकार का ‘संकटमोचक’ बनकर समर्थन करते रहे हैं, उन्होंने भी परिसीमन के मुद्दे पर अपना रुख बेहद कड़ा कर लिया है. इससे सरकार का ‘नंबर गेम’ और भी उलझ गया है. तमाम विरोधों और आंकड़ों की बाजीगरी के बावजूद, सरकार का दावा है कि उसके पास बिल पास कराने के लिए पर्याप्त संख्या बल मौजूद है. अब देखना होगा की सरकार कैसे इन बिलों को पास करा पाती है.
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