सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर की सड़कों से आवारा कुत्तों को पकड़कर शेल्टर होम में रखने के आदेश संशोधन कर दिया है. कोर्ट ने सभी राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. कोर्ट ने कहा पकड़े गए कुत्तों को छोड़ा जाए.
जस्टिस विक्रमनाथ, जस्टिस संदीप मेहता और एन वी अंजारिया की पीठ ने यह फैसला दिया है.
कोर्ट ने कहा कि यह अभी अंतरिम आदेश है, इसलिए संक्षेप में चर्चा की गई है. कोर्ट ने बताया कि हमने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पक्षकार बना दिया है. कोर्ट ने आगे कहा कि हिंसक आवारा कुत्तों को नही छोड़ा जाएगा. कोर्ट ने कहा कि नसबंदी के बाद कुत्तों को छोड़ा जाएगा.
कोर्ट ने कहा कि कोई डॉग लवर या एनजीओ कोर्ट के आदेश में बाधा पहुचाने की कोशिश करते हैं तो उनपर जुर्माना लगाया जाएगा. डॉग लवर पर 25 हजार और एनजीओ पर 2 लाख जुर्माना लगाया जाए. कोर्ट ने कहा कि कोई डॉग को गोद लेना चाहता है तो वह पहले आवेदन देगा. कोर्ट ने एमसीडी सहित अन्य जगह चिन्हित करेगी.
11 अगस्त को एक मामले में लिए गए स्वतः संज्ञान पर सुनवाई के बाद जस्टिस पारदीवाला की बेंच ने यह आदेश दिया है. लेकिन इसके खिलाफ कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थी. जिस पर 14 अगस्त को कोर्ट ने सभी पक्षों की जिरह के बाद फैसला सुरक्षित रखा था. मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि संसद नियम और कानून बनाती है, लेकिन उनका पालन नहीं होता.
उन्होंने कहा था कि एक तरफ इंसान पीड़ित है और दूसरी तरफ पशु प्रेमी यहां खड़े हैं. मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि 2024 में लगभग 37.15 लाख डॉग बाइट के मामले दर्ज किए गए थे, यानी प्रतिदिन लगभग 10000.
एसजी मेहता ने कहा था कि कोई जानवरों से नफरत नहीं करता लेकिन सभी घरों में नहीं रखे जा सकते. बाहर बच्चे खेलते हैं और कुत्ते उन्हें अपना शिकार बना लेते हैं वीडियो इसका प्रमाण है. उन्होंने कहा कि एक तेज आवाज वाली अल्पसंख्यक आबादी आवारा कुत्तों के पक्ष में बोल रही है, जबकि चुपचाप पीड़ित बहुसंख्यक आबादी गंभीर नुकसान झेल रही है, जिनमें बच्चे भी शामिल है. एसजी ने उन लोगों की कथनी और करनी पर सवाल उठाया, जो खुद को पशु प्रेमी बताते हैं, लेकिन मांसाहार के विडियो साझा करते है.
एसजी ने कहा कि आवारा कुत्तों के वजह से बच्चों को खुले में खेलने के लिए नही भेजा जा सकता. कपिल सिब्बल ने इसका जवाब देते हुए कहा कि एबीसी नियमों और संसदीय कानूनों का पालन अनिवार्य है. उन्होंने नगर निगमों की वर्षों की भूमिका पर यह कहते हुए सवाल उठाया कि पर्याप्त शेल्टर नही बनाए गए और नसबंदी की प्रक्रिया भी प्रभावी नही रही, जबकि इसके बाद फंड उपलब्ध था. जिसका दुरुपयोग हो रहा है.
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि बिना नोटिस स्वतः संज्ञान लेकर ऐसा आदेश उचित नहीं. उनको छोड़ा नहीं जाए, यह कैसा आदेश है. सुप्रीम कोर्ट ने पूछा क्या आपने आदेश पढ़ा है. सिब्बल ने कहा जी, सिब्बल ने कहा रोक लगाने का आदेश दीजिए. फिर आगे सुनवाई कर लीजिए. सिब्बल ने कहा कि एबीसी नियमों और संसदीय कानूनों का पालन अनिवार्य है.
-भारत एक्सप्रेस
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