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दिल्ली हाईकोर्ट ने दी दंगे के मामले में आरोपी को गवाह से जिरह करने की अनुमति, निष्पक्ष सुनवाई पर जोर

दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को दिल्ली दंगे से संबंधित एक मामले में निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांतों पर जोर देते हुए एक आरोपी को अभियोजन पक्ष के गवाह से जिरह करने की अनुमति दी. न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी ने आरोपी मोहम्मद दानिश की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि अदालत की प्राथमिकता किसी भी स्थिति में निष्पक्ष सुनवाई होनी चाहिए, और मुकदमे में जल्दबाजी न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ होगी.

त्वरित सुनवाई के बजाय निष्पक्षता को प्राथमिकता

कोर्ट ने दानिश की याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि त्वरित सुनवाई निश्चित रूप से आरोपी के लिए फायदेमंद हो सकती है, जो खुद को निर्दोष साबित करना चाहता है, लेकिन यह मुकदमा निष्पक्ष सुनवाई की कीमत पर नहीं हो सकता. न्यायमूर्ति भंभानी ने यह भी कहा कि मुकदमे में जल्दबाजी से न्याय का कोई फायदा नहीं हो सकता. उनका कहना था कि मुकदमा निष्पक्ष तरीके से होना चाहिए ताकि दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिले और न्याय का पक्ष मजबूत हो.

गवाह की पहचान और जिरह का मुद्दा

दानिश ने अदालत में तर्क दिया था कि अभियोजन पक्ष के गवाह हेड कांस्टेबल (एचसी) शशिकांत ने अपने पहले बयान में उसका नाम नहीं लिया था और न ही उसकी पहचान की थी. हालांकि, जब गवाह ने अदालत में अपना बयान दर्ज कराया, तो उसने दानिश को पहचान लिया. इस पर दानिश के वकील ने कहा कि जिरह के दौरान वे उपस्थित नहीं थे, जिससे गवाह से जिरह नहीं हो पाई. इसलिए, शशिकांत से जिरह की आवश्यकता थी ताकि यह पता चल सके कि गवाह ने अचानक कैसे आरोपी को पहचान लिया, जबकि 2020 में हुई जांच के दौरान उसने दानिश का नाम नहीं लिया था.

सरकारी वकील का तर्क

इस मामले में सरकारी वकील ने कहा था कि गवाह से जिरह के लिए स्थगन नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि इससे मुकदमे में और देरी हो सकती है. हालांकि, कोर्ट ने कहा कि मुकदमे के इस चरण में स्थगन नहीं दिया जाना चाहिए, लेकिन यह निष्पक्ष सुनवाई की कीमत पर नहीं होना चाहिए. कोर्ट ने यह भी कहा कि बयानों की जल्दी सुनवाई करना एक उद्देश्य होता है, लेकिन यदि जिरह करने के लिए उचित कारण हों, तो इसे एक या दो दिन के लिए टालना गलत नहीं हो सकता.

कोर्ट का यह निर्णय यह साबित करता है कि न्यायपालिका हर स्थिति में निष्पक्ष सुनवाई को प्राथमिकता देती है और किसी भी मामले में जल्दीबाजी से बचने के लिए उचित कदम उठाती है. यह फैसले न केवल आरोपी के अधिकारों की रक्षा करते हैं, बल्कि यह सुनिश्चित करते हैं कि मुकदमे की प्रक्रिया में किसी भी प्रकार का अन्याय न हो.

गोपाल कृष्ण

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