सीजेआई बीआर गवई
सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए विधेयक को मंजूरी देने की समय सीमा तय करने के संदर्भ में राष्ट्रपति द्वारा पूछे गए 14 सवालों को लेकर चल रही सुनवाई 28 अगस्त को भी जारी रहेगी. सीजेआई बी आर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ मामले में सुनवाई कर रही है. मामले की सुनवाई के दौरान सीजेआई बी आर गवई ने कहा कि विधानमंडल के दोनों सदनों ने दो मौकों पर मंजूरी दे दी तो राष्ट्रपति और राज्यपाल अनिश्चिकाल तक इस पर क्योंकि बैठे रहते हैं? हम समझते हैं कि हम समय-सारिणी तय नहीं कर सकते, लेकिन अगर कोई बैठ जाए तो क्या अदालत शक्तिहीन हो जाएगी? हम समझते हैं, कि जब संवैधानिक पदाधिकारी शामिल हों, तो अदालत को शक्तियों का दुरुपयोग नहीं मानना चाहिए, हम इस दलील की सराहना करते हैं.
सुनवाई के दौरान मध्य प्रदेश सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल ने बी आर अंबेडकर का हवाला देते हुए कहा कि किसी विधेयक को राज्यपाल के पास क्यों भेजा जाना चाहिए? क्योंकि सलाह देना, चेतावनी देना और पुनर्विचार का सुझाव देना राज्यपाल का कर्तव्य है. अगर ऐसा नहीं है तो राज्यपाल किस काम के? वो अनावश्यक पदाधिकारी बनकर रह जाएंगे. उन्होंने यह भी कहा कि राज्यपाल किसी राजनीतिक दल के प्रतिनिधि नहीं हैं. बल्कि प्रतिनिधित्व करते हैं.
वही महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने कहा अनुच्छेद 200 में राज्यपाल के लिए अपने विवेक का प्रयोग करने की कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं है. इसका स्पष्ट कारण यह है कि राज्यपाल को भविष्य की कार्यवाही के बारे में सोच समझकर निर्णय लेना होगा, जो विभिन्न संस्थाओं के बीच संवैधानिक संतुलन के अनुरूप हो और साथ ही राज्य विधानमंडल के विवेक का भी सम्मान करना होगा.
उन्होंने यह भी कहा कि यह नहीं माना जा सकता कि हर मामले में, जहां राज्यपाल ने तुरंत या कम समय में घोषणा जारी नही की है, राज्यपाल निष्क्रियता के दोषी है. साल्वे ने यह भी कहा कि यह तब तक मौजूद है, जब तक हम अनुच्छेद 201 को दोबारा नहीं लिखते. इसपर सीजेआई ने पूछा क्या इसका मतलब यह है कि केंद्र सरकार किसी राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक को अस्वीकार कर सकती है.
इसका जवाब देते हुए साल्वे ने कहा कि वीटो जैसी शक्ति से बचने की पूरी कोशिश इस बात को नजरअंदाज कर देती है कि अनुच्छेद 201 की भाषा ऐसी किसी सीमा की स्वीकार नहीं करती. उन्होंने यह भी कहा कि राज्यपाल पर कोई समय सीमा नहीं थोपी जा सकती. वह कोई उचें टॉवर में बैठकर फैसले नहीं ले रहे हैं. उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 200 में यह स्पष्ट नहीं है कि राज्यपाल को राष्ट्रपति के विचारार्थ किसी विधेयक को कब स्वीकृति देनी है, कब रोकना है या कब आरक्षित रखना है, तो फिर न्यायपालिका शर्ते कैसे तय कर सकती है? राजस्थान सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्यपाल के लिए समय-सीमा तय करने का विरोध किया है.
राजस्थान सरकार की ओर से पेश पूर्व एडिशनल सॉलिसिटर जनरल व वरिष्ठ वकील मनिंदर सिंह ने राज्यपालों को विधेयक पर निर्णय लेने के लिए समय-सीमा दिए जाने का विरोध किया.
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भारत एक्सप्रेस
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