देश में मासूम बच्चियों के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न और उनके अधिकारों के संरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है. शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई मासूम बच्ची अपने साथ हुए किसी भी तरह के यौन उत्पीड़न की जानकारी देती है, तो उसे पूरी तरह से विश्वसनीय और पुख्ता माना जाएगा. ऐसी स्थिति में, पीड़ित बच्ची से जानकारी पाने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए पुलिस या संबंधित सुरक्षा अधिकारियों को इसकी तत्काल सूचना देना कानूनी रूप से अनिवार्य होगा. ऐसा न करने पर सूचना छिपाने वाले व्यक्ति के खिलाफ भी सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी.
माननीय जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस केवी विश्वनाथन की खंडपीठ ने इस संवेदनशील मामले की सुनवाई करते हुए पॉक्सो (POCSO) एक्ट की व्याख्या की. कोर्ट ने कहा कि यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम की धारा 19 में प्रयुक्त ‘अपराध होने की जानकारी’ शब्द का अर्थ केवल प्रत्यक्ष रूप से (अपनी आँखों से) घटना देखने तक ही सीमित नहीं है. यदि कोई पीड़ित बच्चा या बच्ची किसी शिक्षक, रिश्तेदार, माता-पिता या अन्य किसी भी बालिग व्यक्ति को अपने साथ हुई ऐसी किसी घिनौनी घटना के बारे में मौखिक या लिखित रूप से बताता है, तो कानूनन वही पर्याप्त जानकारी मानी जाएगी. इसके बाद उस बालिग व्यक्ति पर पुलिस को तुरंत रिपोर्ट करने की सीधी कानूनी जिम्मेदारी आ जाएगी.
यह पूरा मामला पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश के एक प्रतिष्ठित स्कूल से जुड़ा हुआ है. यहाँ हॉस्टल में रहने वाली एक महज 8 साल की मासूम बच्ची ने अपने साथ एक सीनियर छात्र द्वारा किए गए यौन उत्पीड़न की लिखित और मौखिक शिकायत अपनी क्लास टीचर (शिक्षिका), अपनी बड़ी बहन और सहपाठियों से की थी. लेकिन स्कूल प्रशासन और संबंधित शिक्षिका ने इस गंभीर मामले को कानूनी रूप से आगे बढ़ाने के बजाय इसे पूरी तरह छिपाने और दबाने की कोशिश की थी.
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में अरुणाचल प्रदेश हाई कोर्ट और निचली अदालत के पिछले रुख पर कड़ी आपत्ति जताई. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट और निचली अदालत यह मानने में बहुत बड़ी कानूनी भूल कर बैठे कि चूंकि पीड़ित बच्ची के शरीर पर यौन उत्पीड़न के कोई स्पष्ट दिखाई देने वाले बाहरी या शारीरिक चोट के संकेत नहीं थे, इसलिए यह मानने का कोई कारण नहीं था कि ऐसा कोई जघन्य अपराध हुआ है. शीर्ष अदालत ने साफ किया कि बच्चों के मामलों में बाहरी शारीरिक निशान होना ही अपराध की एकमात्र कसौटी नहीं है.
अदालत ने अपने आदेश में यह भी पूरी तरह स्पष्ट किया है कि किसी शैक्षणिक या अन्य संस्था के सभी शिक्षकों या पदाधिकारियों पर केवल सामूहिक रूप से पॉक्सो अधिनियम की धारा 21 के तहत दंडनीय अपराध के लिए मुकदमा चलाना कतई जरूरी नहीं है. इस कानून के तहत केवल और केवल उन्हीं चुनिंदा लोगों पर ‘सूचना न देने के अपराध’ के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है, जिन्होंने व्यक्तिगत रूप से पीड़िता से सीधे यह जानकारी या शिकायत प्राप्त की थी कि उसके साथ यौन उत्पीड़न हुआ है और फिर भी उन्होंने पुलिस को नहीं बताया.
बता दें कि हाई कोर्ट द्वारा आरोपियों को राहत देने वाले आदेश के खिलाफ पीड़ित बच्ची की मां ने हिम्मत दिखाते हुए सुप्रीम कोर्ट में विशेष अपील दायर की थी, जिस पर लंबी सुनवाई के बाद यह अहम फैसला आया है. सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस चार्जशीट और साक्ष्यों का अवलोकन करते हुए कहा कि संबंधित आरोपी शिक्षिका के मामले में पुलिस रिपोर्ट में पर्याप्त सामग्री और गवाह मौजूद थे.
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ये साक्ष्य पॉक्सो अधिनियम की धारा 21 और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 176 के तहत दंडनीय अपराध के आरोप तय करने के लिए उस शिक्षिका के खिलाफ ‘गंभीर संदेह’ (ग्रेव सस्पिशन) उत्पन्न करने के लिए बिल्कुल पर्याप्त हैं. इसलिए, आरोपी शिक्षिका को उसके ऊपर लगे इन गंभीर आपराधिक आरोपों से बिल्कुल भी मुक्त (डिस्चार्ज) नहीं किया जा सकता और उन्हें अब ट्रायल का सामना करना होगा.
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