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1920 की सरकारी गजट अधिसूचना बनी मथुरा केस का टर्निंग पॉइंट, सुप्रीम कोर्ट अब 12 अगस्त को करेगा सुनवाई

मथुरा के ऐतिहासिक और बहुचर्चित श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह मस्जिद विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट से एक नया घटनाक्रम सामने आया है. सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) अब मुस्लिम पक्ष की ओर से दायर विभिन्न विशेष अनुमति याचिकाओं पर आगामी 12 अगस्त 2026 को विस्तृत सुनवाई करेगा.

सीजेआई सूर्यकांत की पीठ ने टाली सुनवाई

माननीय मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई को 12 अगस्त तक के लिए स्थगित कर दिया है. इससे पहले, हिंदू पक्ष ने शीर्ष अदालत में याचिका दायर कर कड़ा तर्क दिया है कि मुस्लिम पक्ष की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिकाएं कानूनी रूप से सुनवाई योग्य (मेंटेनेबल) ही नहीं हैं. अब सर्वोच्च न्यायालय हिंदू पक्ष के इस मुख्य दावे की गहराई से जांच करवाएगा कि क्या विवादित ढांचा वास्तव में एक एएसआई (ASI) संरक्षित स्मारक की श्रेणी में आता है या नहीं.

हाई कोर्ट का आदेश प्रथम दृष्टया सही

इस मामले की पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा था कि चूंकि शाही ईदगाह मस्जिद इंतजामिया समिति अपने कानूनी बचाव के लिए मुख्य रूप से ‘पूजा स्थल अधिनियम, 1991’ (Places of Worship Act, 1991) के सख्त प्रावधानों पर निर्भर है, इसलिए मामले के मूल वादी (हिंदू पक्ष) स्थापित कानून के अनुसार इस विवाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और केंद्र सरकार को एक आवश्यक पक्षकार (पार्टी) बनाने की कानूनी मांग कर सकते हैं. शीर्ष अदालत ने यह भी रेखांकित किया था कि इस संबंध में इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा पारित किया गया पिछला आदेश प्रथम दृष्टया (ऑन द फेस ऑफ इट) पूरी तरह सही प्रतीत होता है.

इलाहाबाद हाई कोर्ट के इन फैसलों को दी है चुनौती

शाही ईदगाह मस्जिद समिति की ओर से सुप्रीम कोर्ट में मुख्य रूप से दो अलग-अलग याचिकाएं दायर की गई हैं.

पहली याचिका: इसमें मुस्लिम पक्ष ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस मूल फैसले को चुनौती दी है, जिसके तहत हाई कोर्ट ने हिंदू पक्ष द्वारा दायर दीवानी मुकदमों को सुनवाई के लिए स्वीकार किया था.

दूसरी याचिका: इस याचिका में मुस्लिम पक्ष ने इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा सभी 18 संबंधित दीवानी केसों की एक साथ (संयुक्त) सुनवाई करने के फैसले के खिलाफ दायर की गई उनकी पुनर्विचार याचिका को खारिज करने के आदेश को चुनौती दी है.

एडवोकेट विष्णु शंकर जैन का तर्क

सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष की ओर से देश के प्रसिद्ध अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने पुरजोर शब्दों में कोर्ट से कहा कि इस संपूर्ण विवादित ढांचे का भौतिक संरक्षण और प्रबंधन स्वयं आर्केओलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) कर रहा है, इसलिए कानूनी रूप से वहां कोई मस्जिद अस्तित्व में नहीं हो सकती है. उन्होंने स्पष्ट किया कि चूकि यह एक ऐतिहासिक संरक्षित स्मारक है, इसलिए इस विशिष्ट स्थान पर ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991’ के प्रतिबंधात्मक प्रावधान कतई लागू नहीं होते हैं.

विष्णु शंकर जैन ने पूर्व में इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक प्रार्थना पत्र दायर कर कहा था कि विवादित स्थल को बहुत पहले ही ‘प्राचीन स्मारक’ घोषित किया जा चुका है और इसकी पूरी देखरेख व प्रशासनिक प्रबंधन एएसआई करता है, इसलिए इस मुकदमे में एएसआई और भारत की केंद्र सरकार को औपचारिक पक्षकार बनाया जाना अनिवार्य है; जिसे हाई कोर्ट ने सहर्ष स्वीकार कर लिया था. अब इसी आदेश के खिलाफ मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है.

ये भी पढ़ें: अहमदाबाद एयर इंडिया विमान हादसा: सुप्रीम कोर्ट में AAIB का हलफनामा, अक्टूबर तक आएगी फाइनल रिपोर्ट

अधिवक्ता हरिशंकर जैन की तरफ से दाखिल मूल अर्जी में ऐतिहासिक साक्ष्यों का हवाला देते हुए कहा गया था कि ‘प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम, 1904’ (Ancient Monuments Preservation Act, 1904) के तहत ब्रिटिश काल के दौरान 27 दिसंबर 1920 को एक आधिकारिक अधिसूचना (नोटिफिकेशन) सरकारी गजट में बकायदा प्रकाशित की गई थी. इस ऐतिहासिक गजट अधिसूचना में मथुरा की इस विवादित संपत्ति को पूरी तरह से एक ‘संरक्षित स्मारक’ घोषित किया गया था. कोर्ट अब 12 अगस्त को इन सभी जटिल कानूनी पहलुओं पर अंतिम विचार करेगा.

गोपाल कृष्ण

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