Supreme Court Judgement 2026: सुप्रीम कोर्ट ने बेटियों के अधिकार को लेकर बड़ा फैसला दिया है. कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े मामले में यह फैसला सुनाया है. जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ कहा कि विवाह के बाद भी बेटी परिवार का ही अंग है. किसी बेटी को अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति के लिए सिर्फ इसलिए अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता है, क्योंकि वह विवाहित है.
कोर्ट ने साफ कहा कि वैवाहिक स्थिति किसी महिला को सरकारी कल्याणकारी योजना से वंचित करने का संवैधानिक आधार नही हो सकती.
कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए यह फैसला दिया है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि शादीशुदा बेटी को अनुकंपा नियुक्ति या पारिवारिक लाभ का अधिकार नहीं मिलेगा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शादीशुदा बेटियों को वेलफेयर के तरीकों से बाहर रखना, संविधान के हिसाब से गलत जेंडर स्टीरियोटाइप पर आधारित है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 15 के तहत बराबरी और भेदभाव न करने की गारंटी का उल्लंघन करता है.
कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्कीम में निर्भरता, पैसे की जरूरत और एलिजिबिलिटी जरूरी बातें हैं, न कि यह कि महिला शादीशुदा है या नहीं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शादीशुदा बेटे पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जाता, इसलिए केवल बेटी के मामले में यह शर्त लगाना संविधान के समानता सिद्धांत के खिलाफ है.
कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट और कर्नाटक हाई कोर्ट के उन फैसलों से सहमति जताई, जिसमें कहा गया था कि शादी किसी महिला के अधिकार खत्म करने का आधार नहीं हो सकती. मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की उस दलील को कोर्ट ने खारिज कर दिया कि विवाहित पुत्रियां स्थानीय निवास संबंधी शर्ते को पूरा नहीं कर पाएंगी.
अदालत ने कहा कि सभी विवाहित बेटियों के बारे में एक जैसे धारणा बनाना वास्तविक परिस्थितियों से परे हैं. जिसपर कोर्ट ने कहा कि संबंधित महिला विवाह के बाद भी उसी गांव में रह रही थी और अपनी मां को उचित मूल्य की दुकान के संचालन में सक्रिय सहयोग देती थी.
मां की मौत के बाद उसने अपनी बहनों, जिनमें एक दृष्टिहीन बहन भी शामिल है, की जिम्मेदारी संभाली. इन तथ्यों का सरकार की ओर से भी खंडन नहीं किया गया. बता दें कि यह मामला उत्तर प्रदेश की रहने वाली कुलसुम निशा से जुड़ा था. कुलसुम निशा की मां का राशन की दुकान चलाती थी.
मां की मौत के बाद कुलसुम निशा ने अनुकंपा आधार पर उचित मूल्य की दुकान का लाइसेंस अपने नाम करने के लिए आवेदन किया. लेकिन अधिकारियों ने उसकी अर्जी को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वह शादीशुदा हैं और वर्ष 2019 के सरकारी आदेश के अनुसार परिवार की परिभाषा में केवल अविवाहित बेटी को शामिल किया गया है.
कुलसुम निशा ने इसके खिलाफ हाई कोर्ट में चुनौती दी. उन्होंने कहा कि शादी के बाद भी वह अपने परिवार के साथ ही रह रही थी, मां की दुकान चलाने में मदद करती थीं और अपनी दिव्यांग बहन की देखभाल भी करती थी. उसके बावजूद केवल शादीशुदा होने के आधार पर उन्हें अधिकार से वंचित कर दिया गया. बाद में यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुचा और सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों की जिरह के बाद यह फैसला सुनाया है.
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-भारत एक्सप्रेस
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