राज्य बार काउंसिलों में महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व के प्रावधान का समर्थन करते हुए, देश के 11 राज्यों की महिला उम्मीदवारों और महिला वकीलों ने इसकी नामांकन प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं. महिला अधिवक्ताओं का कहना है कि महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ना बेहद जरूरी है, लेकिन इसके लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी, समान और लोकतांत्रिक होनी चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट की वकील स्वाति सिन्हा सहित देश के विभिन्न राज्यों की महिला उम्मीदवारों ने इस संबंध में खुलकर अपनी बात रखी है और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) से हस्तक्षेप की मांग की है. महिला उम्मीदवारों की प्रमुख चिंताएं और मांगें भी सामने रखी गई हैं.
महिला वकीलों का कहना है कि वे 30 फीसदी महिला प्रतिनिधित्व के सिद्धांत का पूरी तरह समर्थन करती हैं, लेकिन जिस तरह से अलग-अलग राज्यों में नामांकन की प्रक्रिया लागू की जा रही है, उससे ‘बार’ की स्वायत्तता और ‘बार-बेंच’ के बीच का संस्थागत संतुलन प्रभावित होने की आशंका है.
सदस्यों ने हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों (Chief Justices) को नामांकन का अधिकार दिए जाने पर कड़ी चिंता व्यक्त की है. अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के तहत राज्य बार काउंसिल बार का प्रतिनिधित्व करने वाली पूरी तरह से निर्वाचित और स्वायत्त संस्थाएं हैं. महिला वकीलों का तर्क है कि मुख्य न्यायाधीशों को यह शक्ति दिए जाने से बार की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े होते हैं.
महिला अधिवक्ताओं ने मांग की है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को इस संबंध में स्पष्ट और समान नियम निर्धारित करने चाहिए, जिससे पूरे देश में एक जैसी पारदर्शी व्यवस्था लागू हो सके.
संविधान के अनुच्छेद 220 का हवाला देते हुए महिला उम्मीदवारों ने कहा कि स्थायी न्यायाधीश के रूप में पद धारण करने के बाद वकालत करने पर जो प्रतिबंध होते हैं, उसी तर्ज पर रिटायर्ड जजों के नामांकन को लेकर भी गंभीर प्रश्न पैदा होते हैं. इससे स्वतंत्र बार काउंसिल की अवधारणा प्रभावित हो सकती है.
प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया कि कई राज्यों में चुनाव लड़ने वाली महिला उम्मीदवारों ने भारी संख्या में वोट हासिल किए हैं और योग्यता सूची में चौथा, पांचवां, छठा व सातवां स्थान प्राप्त किया है. इसके बावजूद कुछ मामलों में उनके नाम पर विचार नहीं किया जा रहा है. महिलाओं ने कहा कि उन्होंने 1.25 लाख रुपये शुल्क देकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लिया था, इसलिए चुनाव में मिले जनादेश को उचित महत्व मिलना चाहिए.
अधिवक्ता अधिनियम की धारा 3 का हवाला देते हुए महिला वकीलों ने कहा कि राज्य बार काउंसिल के सदस्य जनता द्वारा चुने जाते हैं. ऐसे में चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के पूल से बाहर जाकर बिना किसी पारदर्शी कारण के मनोनयन करना, बार की विधायी मंशा के कितना अनुकूल है, यह एक गंभीर सवाल है. ऐसी व्यवस्था से युवा वकीलों के बीच पक्षपात की धारणा पैदा हो सकती है, जो लोकतांत्रिक लोकाचार के लिए उचित नहीं है.
एनसीएमईआई के कार्यकारी अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) शाहिद अख्त़र जो मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक…
दिल्ली के मावलंकर हॉल में आयोजित पेंटिंग प्रदर्शनी 'डिस्कवर द पावर ऑफ एक्सप्रेशन' में भारत…
SP Singh Baghel: भारत एक्सप्रेस न्यूज नेटवर्क, महाकवि गोपाल दास नीरज फाउंडेशन ट्रस्ट और सोनवी…
नालसार यूनिवर्सिटी में बोलते हुए जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि चुनाव आयोग की SIR…
Vijay Sinha: बिहार सरकार के मंत्री विजय सिन्हा ने कहा कि मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में…
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस रोहिंटन नरीमन ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और वोटर लिस्ट…