Dhanteras 2026: सनातन धर्म में सुख, समृद्धि, वैभव और उत्तम स्वास्थ्य की कामना का महापर्व धनतेरस (धनत्रयोदशी) कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को श्रद्धा व उल्लास के साथ मनाया जाता है. पंचांगीय गणनाओं के अनुसार, इस वर्ष त्रयोदशी तिथि का विस्तार दो दिनों में होने के चलते धनतेरस का पर्व 6 नवंबर (शुक्रवार) और 7 नवंबर (शनिवार) दोनों दिन मान्य रहेगा.
ज्योतिषविदों के अनुसार, दोनों दिनों में अमृत, शुभ, लाभ और चंचल चौघड़िया के कुल मिलाकर 8 श्रेष्ठ मुहूर्त मिल रहे हैं. यानी श्रद्धालुओं और बाजार में खरीदारी करने वाले ग्राहकों को दोनों दिन मिलाकर कुल 12 घंटे का अत्यंत फलदायी समय प्राप्त होगा.
दोनों दिन खरीदारी, नए बहीखाते, आभूषण, वाहन, बर्तन और पूजा सामग्री लेने के लिए निम्नलिखित समय सबसे उत्तम रहेगा:
6 नवंबर (शुक्रवार) के 4 मुहूर्त:
7 नवंबर (शनिवार) के 4 मुहूर्त:
धनतेरस पर केवल बहुमूल्य धातुओं की खरीदारी ही नहीं होती, बल्कि परंपरा में दो अत्यंत साधारण दिखने वाली वस्तुएं आध्यात्मिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण मानी गई हैं:
साबुत धनिया (अन्न और वृद्धि का प्रतीक): पद्म पुराण और स्कंद पुराण में देवी महालक्ष्मी को अन्न, धान्य और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री कहा गया है. धनिया के साबुत बीज बोने पर बहुत तेजी से अंकुरित होकर बढ़ते हैं, इसलिए इन्हें धन, धान्य और आमदनी में सतत वृद्धि का पावन प्रतीक माना जाता है. धनतेरस के दिन सूखा साबुत धनिया खरीदकर माता लक्ष्मी और भगवान धनवंतरी के चरणों में अर्पित किया जाता है. दीपावली पूजन के उपरांत इस धनिए के कुछ बीजों को घर के गमले या बगीचे में बोया जाता है और बाकी को लाल कपड़े में बांधकर तिजोरी में सुरक्षित रख दिया जाता है.
झाड़ू (दरिद्रता निष्कासन का माध्यम): यद्यपि किसी प्राचीन शास्त्रीय ग्रंथ में इसका सीधा उल्लेख नहीं मिलता, किंतु भारतीय लोक परंपरा में झाड़ू को साक्षात ‘महालक्ष्मी’ का क्रियात्मक स्वरूप और दरिद्रता को घर से बाहर निकालने का सबसे बड़ा माध्यम माना गया है. मान्यता है कि झाड़ू घर से नकारात्मक ऊर्जा, अलक्ष्मी, गंदगी और संताप को साफ करती है. इसलिए धनतेरस पर नई झाड़ू खरीदकर घर में स्वच्छता और सकारात्मकता का आह्वान किया जाता है.
इसके अलावा व्यापारी वर्ग इस दिन अपनी तिजोरी, नए बहीखाते, तराजू और कलम-दवात की खरीदारी करते हैं, वहीं आम लोग मिट्टी के दीपक, लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाएं, तांबे, पीतल व कांसे के बर्तन, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और वाहन खरीदते हैं.
श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, जब देवों और दानवों ने अमृत प्राप्ति के लिए क्षीरसागर का मंथन किया, तो उसमें से चौदह दिव्य रत्न निकले. इन्हीं में से जब देवी महालक्ष्मी प्रकट हुईं, तो उनके अभिषेक और शृंगार से 7 विशिष्ट प्रतीक जुड़े, जिन्हें आज भी धनतेरस और दीपावली की पूजा में अनिवार्य माना जाता है:
हाथी (ऐरावत और दिग्गजों का अभिषेक): समुद्र मंथन से चार दांतों वाला श्वेत ऐरावत हाथी और आठों दिशाओं के हाथी प्रकट हुए. देवी के प्रकट होते ही दिशाओं के हाथियों ने स्वर्ण कलशों से उनका अभिषेक किया. यही स्वरूप ‘गजलक्ष्मी’ कहलाता है, जो राजवैभव, सत्ता और अटूट समृद्धि का प्रतीक है.
कमल का पुष्प: देवी लक्ष्मी के प्राकट्य के समय उनके हाथ में कमल था और ब्रह्मा जी ने भी उन्हें दिव्य कमल अर्पित किया. श्रीसूक्त में मां लक्ष्मी को ‘पद्मप्रिया’ और ‘पद्मस्थिता’ कहा गया है. कमल कीचड़ में रहकर भी निष्कलंक रहता है, जो यह संदेश देता है कि धन में सात्विकता और शुचिता होनी चाहिए.
सोने का कलश: देवी के प्राकट्य पर गंगा, यमुना सहित पवित्र नदियां स्वर्ण कलशों में पावन जल लेकर उपस्थित हुईं. पूजा में स्थापित जल से भरा कलश संपूर्ण सृष्टि की संपन्नता, पवित्रता और शुभता का केंद्र है.
आभूषण और मणियां: देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने देवी को अलौकिक आभूषण, सरस्वती जी ने मोतियों का हार और नागों ने कुंडल भेंट किए. इसी पौराणिक प्रसंग के कारण धनतेरस पर सोने-चांदी के गहने खरीदने की परंपरा का सूत्रपात हुआ.
पीले रेशमी वस्त्र और वैजयंती माला: अभिषेक के उपरांत क्षीरसागर ने मां लक्ष्मी को दो पीले रेशमी वस्त्र (पीतांबर) भेंट किए और जल के देवता वरुण ने कभी न मुरझाने वाली वैजयंती माला अर्पित की, जिसके फूलों पर भंवरे गुंजार कर रहे थे.
पंचगव्य (कामधेनु गौ का उपहार): समुद्र मंथन से निकली सुरभि (कामधेनु) गाय ने देवी के अभिषेक के लिए पांच पवित्र द्रव्य-दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर (पंचगव्य) प्रदान किए. साथ ही पृथ्वी ने औषधियां दीं.
चंदन और कुमकुम: देवी के शृंगार के लिए चंदन और कुमकुम का लेप किया गया. इसी कारण आज भी धनतेरस और लक्ष्मी पूजन में रोली, चंदन और अक्षत का अर्चन अनिवार्य माना जाता है.
ब्रिटिश इतिहासकार और कर्नल जेम्स टॉड ने वर्ष 1832 में प्रकाशित अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान’ में लिखा था कि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन भारत का व्यापारी वर्ग अपने संचित स्वर्ण व रजत सिक्कों को गंगाजल से धोकर देवी लक्ष्मी के रूप में पूजता था. टॉड ने 1818 से 1822 के मध्य राजस्थान के राजपूताना क्षेत्रों में इन सांस्कृतिक परंपराओं का प्रत्यक्ष अध्ययन किया था. यह ऐतिहासिक प्रमाण सिद्ध करता है कि दो सदी पूर्व भी भारत में धनतेरस का स्वरूप धन, साख और मर्यादा की पूजा से पूरी तरह जुड़ा हुआ था.
| तिथि / दिन | शुभ चौघड़िया मुहूर्त | क्या खरीदें / धार्मिक महत्व |
|---|---|---|
| 6 नवंबर 2026 (शुक्रवार) | • चंचल: 06:30 AM – 08:00 AM • लाभ: 08:00 AM – 09:30 AM • अमृत: 09:30 AM – 11:00 AM • शुभ: 12:30 PM – 02:00 PM | सोना, चांदी, पीतल के बर्तन, साबुत धनिया, नई झाड़ू, नए बहीखाते और वाहन |
| 7 नवंबर 2026 (शनिवार) | • शुभ: 08:00 AM – 09:30 AM • चंचल: 12:00 PM – 01:30 PM • लाभ: 01:30 PM – 03:00 PM • अमृत: 03:00 PM – 04:30 PM | लक्ष्मी-गणेश प्रतिमा, मिट्टी के दीये, इलेक्ट्रॉनिक सामान, वस्त्र एवं गृह सज्जा सामग्री |
| शाम का विधान | प्रदोष काल (संध्या समय) | दक्षिण दिशा की ओर मुख करके यमराज के निमित्त चौमुखा दीपदान (यमदीप) |
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