Dhanteras 2026: धन आखिर है क्या – सुख का मूल आधार, सामर्थ्य व शक्ति का प्रतीक या फिर मनुष्य के लिए अंतहीन संताप का कारण? भारतीय सनातन वांग्मय और धर्मग्रंथों में धन को लेकर अनेक ऐसे प्रेरक प्रसंग मिलते हैं, जो इसके लौकिक महत्व के साथ-साथ इसकी नैतिक सीमाओं का भी गहन बोध कराते हैं. कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी यानी धनतेरस के पावन अवसर पर भगवान धन्वन्तरि, माता महालक्ष्मी, जगतपालक भगवान विष्णु और धनाध्यक्ष कुबेर की आराधना का विधान है. इस पावन तिथि पर आइए समझते हैं कि हमारे ऋषियों ने धन के किस गूढ़ धर्म और मर्म को उद्घाटित किया है.
रीति से कमाई, नीति से ख़र्च: पुरुषार्थ चतुष्टय में ‘अर्थ’ की मर्यादा
जगत में भौतिक जीवनयापन के लिए धन एक अपरिहार्य साधन है. धन के अभाव में सांसारिक जीवन का निर्वाह लगभग असंभव हो जाता है. सनातन संस्कृति ने सदियों पूर्व इस यथार्थ का साक्षात्कार कर लिया था, इसीलिए जीवन के चार पुरुषार्थों—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—में अर्थ को दूसरे प्रमुख आयाम के रूप में प्रतिष्ठित किया गया.
भारतीय दर्शन भोग के स्थान पर त्याग को श्रेयस्कर मानता है, किंतु त्याग भी वही कर सकता है जिसके पास सामर्थ्य और धन हो! निर्धन व्यक्ति भला किस उपभोग का त्याग करेगा? यही कारण है कि महाभारत में स्पष्ट घोषणा की गई है कि ‘धन के बगैर न धर्म की सिद्धि संभव है और न ही काम की’. श्रीरामचरितमानस में भी गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं—’नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं’. विद्या ददाति विनयं वाले शास्त्र वचन के अंत में भी कहा गया है—’धनाद्धर्मं ततः सुखम्’ यानी धन से ही धर्म कार्य संभव होते हैं और धर्म कार्यों से ही सच्चे आत्मिक सुख की अनुभूति होती है.
हमारे ऋषियों ने ईश्वर को ‘भगवान’ कहा. ‘भग’ का शाब्दिक अर्थ धर्म, अर्थ, ज्ञान, यश, श्री और वैराग्य रूपी षट् ऐश्वर्यों से युक्त होना है. धनतेरस हमें यही सिखाती है कि सदाचार की रीति से कमाया गया और विवेक की नीति से परोपकार में खर्च किया गया धन ही जीवन में अमृत बनता है.
धन्वन्तरि जयंती और आरोग्य: स्वास्थ्य ही है सबसे बड़ा धन
संसार में समस्त वैभव के होते हुए भी यदि शरीर रोगी है, तो त्रिलोक की संपदा भी मिट्टी के समान व्यर्थ हो जाती है. यही कारण है कि धनतेरस पर लक्ष्मी पूजन से पूर्व आरोग्य के देवता भगवान धन्वन्तरि के प्राकट्योत्सव की पूजा का विधान है. पुराणों के अनुसार, समुद्र मंथन के समय क्षीरसागर से जब भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए, तो उनके एक हाथ में दंड और दूसरे में कमण्डलु था. उनके ठीक बाद रूप-सौंदर्य की प्रतीक अप्सराएं निकलीं, जो यह संकेत देती हैं कि वास्तविक सौंदर्य आरोग्य में ही निहित है.
महाभारत के आदिपर्व में उन्हें अमृतघटधारी कहा गया है और सूर्य व शिव के साथ भी उनके नाम का संबंध जोड़ा गया है, क्योंकि वे जगत को रोगमुक्त कर नया जीवन देते हैं. श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कंध के अनुसार, भगवान विष्णु के अंशावतार धन्वन्तरि चौड़ी छाती, सघन देहयष्टि और शंख के समान सुडौल कंठ वाले थे. यह शारीरिक गठन प्रतीक है कि उत्तम स्वास्थ्य और सुदृढ़ काया ही मनुष्य का सबसे पहला और श्रेष्ठ धन है.
जीवन धन है, तो भगवान विष्णु ‘धनेश्वर’ हैं
सनातन परंपरा में सृष्टि के आधार त्रिमूर्ति देवों में भगवान विष्णु जीवन-धन के अधिष्ठाता हैं. ब्रह्मा सृष्टि के रचनाकार हैं और महादेव संहारक, किंतु संसार का पालन-पोषण और जीवन चक्र चलाने का दायित्व भगवान विष्णु पर है. जीवन निर्वाह के लिए धन अनिवार्य है, इसलिए महालक्ष्मी भगवान विष्णु की अर्धांगिनी और सहधर्मिणी बनकर उनके साथ रहती हैं.
भगवान विष्णु के चतुर्भुज स्वरूप में दो हाथों में चक्र और गदा धर्म रक्षा के अस्त्र-शस्त्र हैं, तो शेष दो भुजाओं में सुशोभित पद्म (कमल) और शंख अतुलनीय धन-संपदा के प्रतीक हैं. भारतीय गणितीय परंपरा में पद्म और शंख अत्यधिक उच्च संख्याओं (खरबों-शंखों) के द्योतक हैं. भगवान विष्णु अपने विपन्न भक्तों को उनकी पात्रतानुसार साधन उपलब्ध कराकर उनका संकट हरते हैं. देवी लक्ष्मी का कमलासना और पद्मधारिणी होना यह दर्शाता है कि धन में कमल के समान शुचिता, पवित्रता और सात्विकता होनी चाहिए.
धनेश्वर कुबेर और धन की ‘लीला’: मर्यादा से अधिक संचय ही संताप
सनातन परंपरा में स्वर्ण, रत्न और अक्षय निधियों के अधिपति कुबेर हैं. कुबेर ऋषि विश्रवा और इलविला के पुत्र तथा रावण, कुंभकर्ण व विभीषण के सौतेले भाई हैं. पौराणिक संदर्भों के अनुसार, देवी पार्वती के तेज से उनकी बायीं आंख पीली पड़ गई थी, जिसके कारण उन्हें ‘एकाक्षीपिंगल’ भी कहा जाता है. देवताओं ने कुबेर को कोषाध्यक्ष बनाकर स्वर्णमयी लंका और पुष्पक विमान भेंट किया था.
लोकविश्वास में सर्प गुप्त धन के रक्षक माने जाते हैं, और सर्पों का संहार करने वाला नेवला कुबेर का वाहन है, जो गुप्त धन को संचित कर अपने स्वामी को समर्पित करता है.
धन की श्रेष्ठता उसके सदुपयोग में: कुबेर की शारीरिक संरचना स्थूल और विचित्र (कुबेर का शाब्दिक अर्थ निंदित शरीर वाला) दर्शाई गई है. यह पौराणिक रूपक संकेत करता है कि आवश्यकता से अधिक धन का केवल संचय करना मनुष्य के व्यक्तित्व और मन को विकृत व कुरूप बना देता है. रावण ने कुबेर से लंका और पुष्पक विमान बलपूर्वक छीन लिया था, क्योंकि अत्यधिक संचय की रक्षा स्वयं कुबेर भी नहीं कर सके थे. अतः धन वही श्रेष्ठ है जो जीवन में मर्यादा, सात्विक उपभोग, परोपकार और मानसिक शांति को संभव बनाए. जिस धन से परिवार में कलह और अशांति उत्पन्न हो, उसे शास्त्रों ने सर्वथा त्याज्य माना है.
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