साइंस

Axiom-4 Mission: भारत के शुभांशु शुक्ला ने रचा इतिहास, अब ISS पर करेंगे साइंस के बड़े प्रयोग, जानिए क्या है Axiom-4 मिशन

ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला अब अंतरिक्ष की दुनिया में वो नाम बन चुके हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देंगे. वे अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (ISS) पर जाने वाले पहले भारतीय बन गए हैं और अंतरिक्ष की यात्रा करने वाले राकेश शर्मा के बाद दूसरे भारतीय. ग्रुप कैप्टन शुक्ला Axiom-4 मिशन के तहत अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन पर गए हैं.

Axiom-4 एक प्राइवेट स्पेस मिशन है जिसे अमेरिकी कंपनी Axiom Space, NASA और SpaceX की साझेदारी में चला रही है. यह मिशन पूरी तरह से कमर्शियल है, यानी सरकारों से अलग, प्राइवेट लेवल पर संचालित हो रहा है. लेकिन खास बात ये है कि शुभांशु शुक्ला की इस यात्रा को भारत सरकार ने पूरी तरह फंड किया है.

कितनी लगी कीमत?

इस मिशन में भारत ने कुल 548 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. इसमें शामिल है – शुक्ला की अंतरिक्ष यात्रा, ट्रेनिंग, लॉन्च की तैयारी, ISS में ठहरने की व्यवस्था, और वहां किए जाने वाले रिसर्च कार्य. इस निवेश को भारत के महत्वाकांक्षी मानव अंतरिक्ष मिशन गगनयान (2027) की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है.

नहीं दी गई सैलरी

शायद ये सुनकर आप चौंकें कि शुक्ला को इस मिशन के लिए कोई वेतन नहीं दिया जा रहा है. उनका यह सफर पूरी तरह देश की सेवा और वैज्ञानिक योगदान की भावना से प्रेरित है.

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शुभांशु शुक्ला अंतरिक्ष में क्या करेंगे?

14 दिन के इस मिशन में शुक्ला इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर करीब 60 वैज्ञानिक प्रयोग करेंगे. इनमें खासतौर पर ध्यान दिया जाएगा-

स्पेस न्यूट्रिशन यानी अंतरिक्ष में पोषण पर रिसर्च

फूड सस्टेनेबिलिटी यानी लंबे समय तक स्पेस में खाने की टिकाऊ व्यवस्था

जीरो ग्रैविटी में बीजों की रीजनरेशन यानी बिना गुरुत्वाकर्षण के पौधे उगाने के तरीके

ये सारे प्रयोग जीवन विज्ञान, मानव शरीर विज्ञान और धरती के अध्ययन जैसे विषयों को नई दिशा दे सकते हैं.

भारत की वैज्ञानिक उड़ान को मिला नया पंख

Axiom-4 न सिर्फ भारत के लिए एक बड़ा तकनीकी कदम है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की उपस्थिति को और मजबूत करता है. शुभांशु की इस यात्रा को ‘स्पेस डिप्लोमेसी’ का भी हिस्सा माना जा रहा है. जहां विज्ञान के ज़रिए दुनिया से जुड़ाव और सहयोग की नई राहें खुल रही हैं.

क्यों है ये मिशन खास?

जहां राकेश शर्मा का मिशन सोवियत संघ की मदद से हुआ था, वहीं शुभांशु शुक्ला का मिशन एक नए युग की शुरुआत है. जहां अंतरिक्ष यात्राएं अब सिर्फ सरकारों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि प्राइवेट और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से विज्ञान का नया अध्याय लिखा जा रहा है.

– भारत एक्सप्रेस

Govind Kumar Singh

मैं गोविंद सिंह हूं और मूल रूप से बिहार के कैमूर की पहाड़ियों वाले इलाके से आता हूं। मेरी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई वाराणसी के उदय प्रताप कॉलेज से हुई। इसके बाद मैंने पटना कॉलेज, पटना से मास कम्यूनिकेशन में ग्रेजुएशन किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने करियर की शुरुआत की और अलग-अलग संस्थानों में काम करते हुए खबरों की दुनिया को करीब से समझा। अपने पेशेवर सफर में मुझे ईटीवी भारत, इनशॉर्ट्स और श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन जैसे संस्थानों के साथ काम करने का अवसर मिला। इन जगहों पर काम करते हुए मैंने रिपोर्टिंग, कंटेंट लेखन, रिसर्च और समाचारों की प्रस्तुति से जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातें सीखीं। फिलहाल मैं भारत एक्सप्रेस में सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हूं। यहां मेरी मुख्य रुचि विदेश, राजनीति और बिहार से जुड़ी खबरों को कवर करने में है।

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