आस्था

कलयुग के श्रवण कुमार: कांवड़ में गंगाजल के साथ 95 वर्षीय दादाजी को बैठाकर निकले दो पोते

95 Year Old Grandfather Kanwar Yatra: सावन के पावन महीने में जहां हर ओर बोल बम के जयकारे गूंज रहे हैं, वहीं अलीगढ़ में भक्ति, सेवा और संस्कार का ऐसा अद्भुत दृश्य देखने को मिला जिसने हर किसी की आंखें नम कर दीं. बुलंदशहर के रामघाट से दो सगे भाई कृष्णा और भूदेव अपने 95 वर्षीय दादाजी हरीशचंद्र को कांवड़ में बैठाकर वृंदावन के लिए पैदल यात्रा पर निकले. कांवड़ के एक ओर चार कलशों में गंगाजल रखा गया, जबकि दूसरी ओर दादाजी विराजमान थे. यह अनोखा दृश्य जिसने भी देखा, वह दोनों युवकों को कलयुग का श्रवण कुमार कहने लगा.

दादाजी को दिया जीवन का सबसे बड़ा उपहार

दोनों पोतों ने बताया कि उन्होंने बिना किसी को बताए दादाजी को यह भक्ति भरा सरप्राइज दिया. पहले उन्हें रामघाट में गंगा स्नान कराया और फिर कांवड़ में बैठाकर वृंदावन धाम की यात्रा शुरू कर दी. उम्र के इस पड़ाव पर दादाजी के चेहरे पर दिखाई दे रही खुशी और संतोष ने यात्रा को और भी भावुक बना दिया. पोतों का कहना है कि दादाजी की सेवा और उन्हें तीर्थ यात्रा कराने का अवसर उनके लिए भगवान शिव की कृपा से कम नहीं है.

अलीगढ़ में हुआ भावभीना स्वागत

जब यह अनोखी कांवड़ यात्रा अलीगढ़ के दुबे के पड़ाव पर रात्रि विश्राम के लिए पहुंची तो श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी. लोगों ने तालियों की गड़गड़ाहट और “जय भोलेनाथ” के जयकारों के साथ दोनों भाइयों का भव्य स्वागत किया. कई श्रद्धालु इस दृश्य को अपने मोबाइल कैमरों में कैद करते नजर आए, जबकि अनेक लोगों की आंखें भावुक होकर छलक उठीं. हर कोई दोनों पोतों के संस्कार और सेवा भावना की सराहना करता दिखा.

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समाज के लिए बनी प्रेरणा

आज के दौर में, जब व्यस्त जीवनशैली के कारण रिश्तों में दूरियां बढ़ने की बातें अक्सर सुनने को मिलती हैं, ऐसे में कृष्णा और भूदेव ने अपने दादाजी को कांवड़ में बैठाकर यह साबित कर दिया कि भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों का सम्मान और सेवा आज भी जीवित है. उनकी पहली कांवड़ यात्रा केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि प्रेम, समर्पण, पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों का ऐसा संदेश बन गई, जिसने हजारों लोगों के दिलों को छू लिया. यह अनूठी पहल आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन गई है.

भारत एक्सप्रेस

Swati Pandey

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