आस्था

सात भाइयों की लाडली वीरवती की वह कथा, जिसके बिना अधूरा है करवा चौथ का व्रत

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर मनाए जाने वाले करवा चौथ 2026 के पावन पर्व पर सुहागिनें अपने पति की लंबी उम्र और अखंड सौभाग्य के लिए निर्जला उपवास रखती हैं. इस व्रत का महत्व तब तक पूरा नहीं होता जब तक इसकी पौराणिक कथा न पढ़ी या सुनी जाए. इंटरनेट और समाज में karva chauth ki kahani या karva chauth vrat katha को लेकर बहुत सी बातें प्रचलित हैं, लेकिन सात भाइयों की बहन वीरवती की पूरी और असली कहानी जानना हर सुहागिन के लिए बहुत जरूरी है. आइए विस्तार से जानते हैं इस व्रत की संपूर्ण कथा:

करवा चौथ की संपूर्ण पौराणिक कथा (karva chauth vrat kahani)

एक समय की बात है, एक साहूकार के सात पुत्र और एक इकलौती प्यारी बहन थी, जिसका नाम वीरवती था. वह सातों भाइयों की लाडली थी, इसलिए उसका विवाह एक अच्छे घर में होने के बाद भी उसके सभी भाई उससे बहुत स्नेह करते थे. जब कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि आई, तो बहन वीरवती ने भी अपने सुहाग की लंबी उम्र के लिए पहला करवा चौथ का व्रत रखा.

सुबह से ही वीरवती ने बिना अन्न और जल के पूरा दिन बिताया. शाम होते-होते भूख और प्यास के मारे उसकी हालत बेहद खराब होने लगी और वह बार-बार बेहोश होने जैसी स्थिति में आ गई. बहन की यह दयनीय हालत उसके सातों भाइयों से देखी नहीं गई. भाइयों ने अपनी बहन से कहा, ‘प्रिय बहन! हमसे तुम्हारी यह हालत देखी नहीं जाती, तुम भोजन क्यों नहीं कर लेती?’

वीरवती ने जवाब दिया, ‘भैया, आज मेरा करवा चौथ का व्रत है और मैं चांद को अर्घ्य दिए बिना कुछ नहीं खा सकती. अभी चांद नहीं निकला है, इसलिए मुझे थोड़ा इंतजार करना होगा.’

भाइयों को अपनी बहन की इस हालत पर बहुत दया आई. उन्होंने मिलकर एक तरकीब निकाली. उन्होंने घर से कुछ दूर जंगल में जाकर एक पीपल के पेड़ की ओट में आग जलाई और उसके आगे एक छलनी रख दी, जिससे दूर से देखने पर ऐसा आभास हुआ कि आसमान में बड़ा सा चांद निकल आया हो. इसके बाद एक भाई दौड़कर घर आया और अपनी बहन से बोला, ‘देख बहन! चांद निकल आया है, अब तू जल्दी से आओ और चंद्रमा को अर्घ्य देकर अपना व्रत खोल लो.’

खुशी से फूली न समाई वीरवती ने बिना किसी शक के अपनी भाभियों से कहा, ‘चलो भाभी, चांद निकल आया है, आप लोग भी मेरे साथ अर्घ्य दे लो.’

यह सुनकर उसकी एक समझदार भाभी बोली, ‘बहन! अभी चांद निकलने का समय नहीं हुआ है, तुम्हारे भाइयों ने तुम्हारे साथ कोई छल किया है.’ लेकिन वीरवती ने भाइयों की बात पर विश्वास कर लिया और जल्दी-जल्दी में कृत्रिम चंद्रमा को अर्घ्य देकर भोजन करने बैठ गई.

जैसे ही उसने भोजन का पहला टुकड़ा तोड़ा, उसमें बाल निकल आया. दूसरा टुकड़ा तोड़ा तो उसे जोर से छींक आ गई. और जैसे ही उसने तीसरा टुकड़ा मुंह में डालने की कोशिश की, तभी राजा के यहाँ से एक दूत आ गया और उसने बताया कि उसके पति की अचानक से तबीयत बेहद खराब हो गई है और वह अचेत अवस्था में हैं.

यह भयानक खबर सुनते ही वीरवती के पैरों तले जमीन खिसक गई. वह तुरंत रोते-बिलखते अपने ससुराल के लिए रवाना हुई. जब वह घर पहुंची तो उसने देखा कि उसका पति मृत अवस्था में लेटा हुआ था. यह सब देखकर उसकी मां ने उसे सफेद कपड़े पहनाकर और पल्ले में एक सोने का सिक्का बांधकर विदा करते हुए कहा, ‘बेटी! रास्ते में जो भी मिले, उसके पैर पड़ती जाना और जो तुझे सुहाग की आशीष दे, उसे यह सोने का सिक्का दे देना.’

रास्ते में उसे जो भी मिला, वह सबके पैर पड़ी, लेकिन किसी ने भी उसे सुहाग की आशीष नहीं दी क्योंकि उसका पति तो पहले ही दुनिया छोड़ चुका था. अंत में जब वह अपने घर पहुंची, तो दरवाजे पर उसकी छोटी ननद खड़ी थी. वीरवती ने जैसे ही अपनी ननद के पैर छुए, ननद के मुंह से अनजाने में निकल पड़ा-‘सदा सुहागन रहो, सीली हो, सपूती हो, सात बेटों की मां बनो और मेरे भाई का सुख भोगो!’

नंद के मुख से यह आशीर्वाद सुनते ही वीरवती ने तुरंत अपना सोने का सिक्का उसे सौंप दिया और पल्ले में गांठ लगा ली. इसके बाद वह अंदर आई और अपने मृत पति के शव को एक कोठरी में रखकर उसकी सेवा में जुट गई. पूरे एक साल तक उसने बिना किसी शिकायत के दिन-रात अपने पति के शरीर की सेवा की. इस दौरान उसकी सास केवल एक बांदी के हाथों बची-कुची रोटियां उसके पास भिजवा देती थी.

देखते-देखते फिर से कार्तिक मास का करवा चौथ का व्रत आ गया. पड़ोस की सभी सुहागिन महिलाओं ने सुंदर श्रृंगार किया, मेहंदी लगाई और व्रत की तैयारी की. वीरवती को एक पड़ोसन ने आकर कहा, ‘बहन! तू भी इस बार करवा चौथ का व्रत रख ले, चौथ माता तेरी सुहाग की रक्षा जरूर करेंगी.’

पड़ोसन के कहने पर वीरवती ने इस बार भी पूरे नियम-धमर्म के साथ करवा चौथ का व्रत रखा. व्रत के दिन बाजार से करve (करवा) खरीदने की बारी आई. वह गली में चिल्लाई-‘भाइयों की प्यारी, करवे ले लो री करवे!’

वहां से पांच बहनें गुजरीं, लेकिन किसी ने भी उसे करवा नहीं दिया. अंत में छठी बहन आई और उसने कहा, ‘देख री बहन! मेरी सातवीं बहन आगे आ रही है, वह तुझे करवे देगी. लेकिन उसके पैरों में कांटे बिखेर देना. जब वह करवे लेकर चिल्लाती हुई आए, तो उसके पैर में कांटा चुभ जाएगा. तब तू उसका पैर पकड़कर बैठ जाना और तब तक मत छोड़ना जब तक वह तुझे आशीर्वाद न दे. जब वह तुझे आशीर्वाद देगी, तभी तुझे करवे मिलेंगे.’

वीरवती ने ठीक वैसा ही किया. उसने रास्ते में कांटे बिछा दिए. जब सातवीं बहन करवे लेकर आई, तो उसके पैर में कांटा चुभ गया. वीरवती ने तुरंत उसका पैर पकड़ लिया और कांटा निकाल दिया. प्रसन्न होकर उस महिला ने आशीर्वाद दिया- ‘भाई जियो, सांई जियो!’

वीरवती ने कहा, ‘अब तुमने मुझे आशीर्वाद दे ही दिया है, तो मुझे करवा भी देकर जाओ.’ उस महिला ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘तूने तो मुझे ठग लिया,’ और उसे करवे सौंप दिए.

करवे मिलने के बाद वीरवती ने विधि-विधान से karva chauth puja time पर चौथ माता की पूजा की, उजमन किया और कथा सुनी. माता की असीम कृपा से उसका मृत पति धीरे-धीरे जीवित हो गया और उठकर बैठ गया. उसने कहा, ‘अरे! मैं इतनी गहरी नींद में कैसे सो गया था?’

वीरवती ने रोते हुए कहा, ‘सोए नहीं स्वामी, मुझे तुम्हारी सेवा करते-करते पूरे बारह महीने बीत गए हैं.’

उसी समय महल के अंदर पति-पत्नी को हंसते-खेलते और चौपड़ खेलते देख बांदी ने जाकर सास को बताया. सास ने जब अपनी आंखों से यह चमत्कार देखा, तो वह खुशी से पागल हो गई. उसने बहू को गले से लगा लिया. इसके बाद राजा ने पूरे राज्य में ढिंढोरा पिटवा दिया कि हर साल अपनी पति की लंबी उम्र और दीर्घायु के लिए सभी बहनें और सुहागिनें करवा चौथ का यह पावन व्रत पूरी निष्ठा के साथ रखें.

करवा चौथ व्रत का महात्म्य (karva chauth vrat Importance)

हिन्दू धर्म में इस उपवास का बहुत बड़ा महत्व है. महाभारत काल में जब पांडवों पर विपत्तियां आईं और अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी पर्वत गए, तब द्रौपदी की चिंता दूर करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें यही कथा सुनाई थी. श्रीकृष्ण ने बताया था कि यह व्रत वैवाहिक जीवन की हर बाधा, आपसी मतभेद और संकटों का नाश करने वाला है. इस दिन विवाहित महिलाएं सरगी खाकर दिनभर निर्जला उपवास रखती हैं, गेहूं या चीनी के करवे से पूजा करती हैं और अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य तथा दीर्घायु की कामना करती हैं.

चांद को देखकर क्यों खोला जाता है व्रत?(aaj chand kitne baje nikalega)

सुहागिनों के इस व्रत में चंद्र दर्शन का विशेष स्थान है. सवाल यह भी उठता है कि aaj chand kitne baje nikalega या aaj chand kitne baje niklega? ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चंद्रमा को मन, शीतलता, आयु और प्रेम का कारक माना गया है. करवा चौथ की रात छलनी से चंद्रमा को देखने के बाद अर्घ्य दिया जाता है, जिसके पीछे यह भावना होती है कि सुहागिन महिला चंद्रमा की ठंडी और पावन किरणों की तरह अपने पति के जीवन में शीतलता और लंबी उम्र का आशीर्वाद भर दे.

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-भारत एक्सप्रेस

Rohit Agrawal

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