परशुराम भगवान (श्री हरि) के दशावतार में से एक हैं. वह दीर्घायु हैं, जिनकी उपस्थिति सनातन धर्मग्रंथों में वर्णित चतुर्युग के 3 युगों में मिलती है. त्रेतायुग में परशुराम का जन्म ब्राह्मण ऋषि जमदग्नि के यहां उनकी पत्नी रेणुका के गर्भ से हुआ था. भारतीय पौराणिक इतिहास से रूबरू हुए सभी लोगों ने कभी न कभी परशुरामजी के बारे में एक बात जरूर सुनी होगी कि, परशुरामजी ने पृथ्वी को 21 बार क्षत्रियों से विहीन कर दिया था, उन्होंने बार-बार अकेले ही क्षत्रिय-वीरों का नाश किया.
श्रीरामचरितमानस में परशुरामजी का प्रसंग है, जिसमें यह कहा गया है कि, उन्होंने पृथ्वी से हैहय वंश के क्षत्रियों एवं उनके सहयोगियों का 21 बार नाश किया था. पृथ्वी पापाचारी क्षत्रियों से खाली हो गई, तो वीभत्स घटना के बाद परशुराम ने पृथ्वी को कश्यप मुनि को दान कर दिया था. उसके बाद से परशुराम का पृथ्वी पर रहना वर्जित हो गया था. परशुराम को भगवान का आवेशावतार या क्रोधावातर भी माना जाता है. उनके बारे में एक बात यह भी कही जाती है कि, उन्होंने अपने पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए अपनी मां तक का गला काट दिया था.
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कथावाचक अनुरुद्धाचार्यजी कहते हैं कि, त्रेतायुग में हैहय वंश के क्षत्रियों की मनमानी से पृथ्वी पर पाप का बोझ बढ़ गया था. इसी वंश में एक हजार हाथों वाला राजा सहस्त्रार्जुन हुआ था. उसका वास्तविक नाम कार्तवीर्य अर्जुन था, जिसे गुरु दत्तात्रेय से एक हजार भुजाएं वरदानस्वरूप मिली थीं, इसलिए उसे सहस्त्रबाहु कहा जाता था. वह बड़ा बलशाली था. उसने राक्षसराज रावण को भी हरा दिया था और उसे बंदी बना लिया था. एक बार वह ऋषि जमदग्नि के आश्रम में आया, उन्हें अपमानित करके वहां से चला गया. जमदग्नि के पुत्र परशुराम को पता चला तो उन्होंने सहस्त्रबाहु को उसी की महिष्मति नगरी में जाकर मार डाला.
सहस्त्रबाहु के गुस्साए पुत्रों ने परशुराम की अनुपस्थिति में उनके पिता जमदग्नि की हत्या कर दी. परशुराम जब तीर्थयात्रा से लौटे तो उन्हें अपने पिता की हत्या की सूचना मिली. फिर उन्होंने सहस्त्रबाहु के पुत्रों, उनके सगे-संबंधियों समेत हैहय वंश का समूचा नाश करने का संकल्प लिया. वह अकेले ही फरसा लेकर उन्हें मारते चले गए. परशुराम ने रक्त की नदियाँ बहा दीं. ऐसा कुल इक्कीस बार किया, तब जाकर उनके प्रतिशोध की अग्नि शांत हुई.
-भारत एक्सप्रेस
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