नोएडा (गौतम बुद्ध नगर)। 81 दिवसीय ‘गविष्टि (गोरक्षार्थ धर्मयुद्ध)’ यात्रा के क्रम में ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का नोएडा और अलीगढ़ में भव्य स्वागत किया गया। नोएडा कार्यक्रम के समन्वयक सुरेश मनचंदा ने बताया कि इस यात्रा के माध्यम से सरकार से गोमाता को ‘राष्ट्रमाता’ घोषित करने की मांग की जा रही है।
प्रमुख विशेषताएं:
यात्रा का नाम: गविष्टि (गोरक्षार्थ धर्मयुद्ध)
अवधि: 3 मई से 24 जुलाई 2026, 81 दिन
‘वात्सल्य’ का गणित और अस्मिता का प्रश्न
नोएडा और अलीगढ़ में आयोजित सार्वजनिक सभाओं को संबोधित करते हुए शंकराचार्य ने गोमाता और मानव माता के बीच अविभाज्य संबंध का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि संस्कृत के ‘वात्सल्य’ शब्द का मूल ‘वत्स’ (बछड़ा) है, यानी मां का प्यार मूलतः उसी प्रेम का विस्तार है जो एक गाय अपने बछड़े के प्रति रखती है।
“जब आप अपनी मां को ‘मां’ कहते हैं, तो यह शब्द आपने बछड़े से सीखा है, जो भूखा होकर अपनी माता को पुकारता था,” शंकराचार्य ने कहा। उन्होंने कहा कि भारत के किसी भी नागरिक से पूछिए कि गाय पशु है या माता? कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसके लिए यह प्रश्न उठता हो। यह संशय केवल सरकारी काग़ज़ों में है, जो अंग्रेज़ों ने लिखे थे और आज़ादी के 78 साल बाद भी नहीं सुधारे गए।
‘गविष्टि मात्रा न विद्यते’
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने वैदिक मंत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि गाय को किसी भी पैमाने से नहीं नापा जा सकता। “गविष्टि मात्रा न विद्यते” का अर्थ है कि संसार की हर चीज़ को मापा जा सकता है, लेकिन गाय को नहीं। उन्होंने कहा कि गाय की सेवा का लाभ, उसकी औषधीय शक्ति और आशीर्वाद — यह सब असीम है।
प्रशासनिक उदासीनता पर कसा तंज
शंकराचार्य ने कहा कि 78 साल की आज़ादी में किसी भी सरकार ने गाय को ‘पशु’ कहे जाने वाले अंग्रेज़ी काग़ज़ों को नहीं बदला। उन्होंने कहा, “हमारे नेता एक तरफ़ गाय के साथ फ़ोटो खिंचवाते हैं, उसे आरती देते हैं और दूसरी तरफ़ बीफ़ निर्यात के आंकड़े बढ़ते हैं। भक्ति का वेश धारण करके कसाई जैसा कृत्य — यही समस्या है।”
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा दिए गए ‘मां-बेटे के बीच घोषणा की आवश्यकता नहीं’ वाले तर्क पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि जब तक घोषणा नहीं होगी, न तो कोई क़ानून होगा, न कोई सुरक्षा प्रोटोकॉल।
‘वोट की वापसी’ का अस्त्र
गौरक्षा के लिए रणनीति में बदलाव की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए शंकराचार्य ने कहा, “धरनों से कुछ नहीं होता। उनसे केवल भक्तों को धूप लगती है, जबकि नेता एयर कंडीशनर में बैठे रहते हैं।” उन्होंने कहा कि मतदाताओं द्वारा विधानसभा-दर-विधानसभा ‘वोट न देने’ का संकल्प ही सबसे प्रभावी हथियार है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह आंदोलन किसी विशेष राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। “हर दल से एक ही बात है: वोट चाहिए तो गोमाता को राष्ट्रमाता घोषित करो। सत्ता में हो तो संसद या विधानसभा में प्रस्ताव पारित करो, विपक्ष में हो तो प्रतिबद्धता दो।”
आध्यात्मिक और चुनावी टकराव
शंकराचार्य ने सत्ता में बैठे नेताओं को परलोक की चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा कि मृत्यु के बाद जब यमराज के सामने हिसाब देना होगा, तो प्रोटोकॉल काम नहीं आएगा। उनके काग़ज़ों में यह दर्ज होगा कि शासनकाल में कितनी गायों का वध हुआ।
महासंकल्प और आगे का रास्ता
3 मई को गोरखपुर से प्रारंभ यह यात्रा प्रदेश की सभी 403 विधानसभाओं की परिक्रमा कर रही है। कार्यक्रम समन्वयक सुरेश मनचंदा ने जानकारी दी कि 24 जुलाई 2026 को लखनऊ में एक ‘अक्षौहिणी सेना’ (2,18,700 धर्म सैनिक) के जुटने की योजना है। यदि तब तक सरकार ने गाय को राष्ट्रमाता घोषित करने का ठोस क़दम नहीं उठाया, तो अगले चरण का आंदोलन और तेज़ किया जाएगा।
सभा का समापन सामूहिक घोषणा के साथ हुआ कि आगामी चुनावों में वोट उसी पार्टी को दिया जाएगा जो इस विषय पर खुलकर और लिखित रूप में प्रतिबद्धता जताएगी।
—- भारत एक्सप्रेस
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