यूटिलिटी

अब हवा में उगेगा आलू! ग्वालियर कृषि विश्वविद्यालय की एरोपोनिक्स तकनीक से किसानों की कमाई होगी दोगुनी

Potato Cultivation in Air: मध्य प्रदेश के किसानों के लिए खेती की दुनिया से एक ऐसी खबर आई है, जो आने वाले समय में उनकी कमाई और खेती का तरीका दोनों बदल सकती है. ग्वालियर स्थित राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने आलू की खेती में एक बिल्कुल नई राह खोल दी है. अब आलू उगाने के लिए न तो खेत की जरूरत होगी और न ही मिट्टी की. हैरानी की बात है कि यह आलू हवा में उगाया जाएगा.

मिट्टी नहीं, फिर भी लहलहाएगी फसल

इस नई तकनीक को एरोपोनिक्स कहा जाता है. इसमें पौधों को जमीन में बोने के बजाय हवा में लटकाया जाता है. विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इसके लिए खास डिजाइन तैयार किया है, जिसमें थर्माकोल शीट में छोटे-छोटे छेद किए जाते हैं.

इन छेदों से पौधे इस तरह लगाए जाते हैं कि पत्तियां ऊपर रोशनी की ओर रहती हैं और जड़ें नीचे एक अंधेरे बॉक्स में लटकी रहती हैं. इन्हीं जड़ों पर कंप्यूटर से नियंत्रित मशीनें हर कुछ मिनट में पानी और पोषक तत्वों की महीन फुहार छिड़कती हैं. इससे पौधे को सीधे और संतुलित पोषण मिलता है.

बीमारी का खतरा लगभग खत्म

इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि मिट्टी न होने की वजह से फंगल इंफेक्शन और जमीन से फैलने वाली बीमारियों का खतरा ना के बराबर रह जाता है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस तरीके से उगाए गए आलू पूरी तरह रोग-मुक्त होते हैं और उनके कंद भी एक जैसे आकार के बनते हैं, जो बाजार और प्रोसेसिंग इंडस्ट्री के लिए बेहद फायदेमंद है.

कम बीज, ज्यादा पैदावार

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर अरविंद कुमार शुक्ला बताते हैं कि एरोपोनिक्स तकनीक किसानों के लिए “कम खर्च, ज्यादा मुनाफा” का मॉडल साबित हो सकती है. आमतौर पर एक एकड़ में आलू बोने के लिए 8 से 10 क्विंटल बीज लगते हैं और पैदावार करीब 100 क्विंटल होती है. लेकिन एरोपोनिक्स से तैयार बीज इतने गुणवत्तापूर्ण होते हैं कि एक एकड़ के लिए सिर्फ 1.20 क्विंटल बीज काफी है. इसके बावजूद पैदावार 238 क्विंटल तक पहुंच सकती है.

ये भी पढ़ें- सोना-चांदी हुआ सस्ता; चांदी में ₹25,000 की ऐतिहासिक गिरावट, सोने के दाम भी गिरे, जानें आज का ताजा भाव

चिप्स कंपनियों की पसंद है ये आलू

इस तकनीक से खास तौर पर ‘लेडी रोसेटा’ किस्म के आलू के बीज तैयार किए जा रहे हैं. यह आलू लाल रंग का, गोल आकार का और लो-शुगर वाला होता है. इसी वजह से इससे बने चिप्स तलने पर काले नहीं पड़ते, बल्कि सुनहरे और क्रिस्पी बनते हैं. यही कारण है कि बड़ी चिप्स कंपनियां इस किस्म के आलू के लिए सीधे किसानों से संपर्क करती हैं. अब तक मध्य प्रदेश के किसान इस बाजार से थोड़ा दूर थे, लेकिन आने वाले दो-तीन साल में उन्हें भी यह मौका मिलने वाला है.

पानी की बचत और भविष्य की खेती

इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत लैब में टिश्यू कल्चर से होती है, जहां पौधों को तैयार कर एरोपोनिक्स यूनिट में भेजा जाता है. इस तकनीक में पानी भी बेहद कम खर्च होता है, क्योंकि इस्तेमाल किया गया पानी दोबारा साफ होकर फिर काम में लिया जाता है. वैज्ञानिक मानते हैं कि जिन इलाकों में जमीन कम है या मिट्टी की हालत खराब हो चुकी है, वहां यह तकनीक खेती के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकती है.

Also Follow Bharat Express on Youtube

-भारत एक्सप्रेस

Radha Priya

Recent Posts

भारत एक्सप्रेस की मुख्य सहभागिता में इंदौर का पत्रकारिता का महाकुंभ संपन्न

इंदौर में स्टेट प्रेस क्लब द्वारा आयोजित 18वें तीन दिवसीय भारतीय पत्रकारिता महोत्सव का रविवार…

19 minutes ago

‘मेहनती लोगों को कचरा समझते…’ संभव जैन सुसाइड पर समय रैना का कथित कमेंट वायरल

नोएडा की सुपरनोवा बिल्डिंग में सॉफ्टवेयर इंजीनियर संभव जैन के सुसाइड के बाद स्टैंड-अप कॉमेडियन…

19 minutes ago

क्या गुल खिला रहे हैं बृजभूषण?…’ सपा अध्यक्ष श्यामलाल पाल के मुंह से सब निकला

Shyamalal Pal On Brijbhushan Sharan Singh: उत्तर प्रदेश में इन दिनों विधान परिषद चुनाव के…

1 hour ago

शराब के लिए मांगे पैसे, मना करने पर औरैया के कलयुगी बेटे ने मां को उतारा मौत के घाट

औरैया में शराब के लिए पैसे न देने पर 70 वर्षीय मां की पीट-पीटकर हत्या…

1 hour ago