उत्तर प्रदेश

पेट्रोल में डाला जा रहा 20% इथेनॉल, फिर भी क्यों परेशान हैं गन्ना किसान? यूपी के हाथी करौदा गांव से Bharat Express की ग्राउंड रिपोर्ट

प्रशांत त्यागी, शामली


“इथेनॉल बनने से गन्ने की पूछ बढ़ गई, यह बात कागजों और भाषणों में जितनी अच्छी लगती है, जमीन पर उतनी ही खोखली है. खाद, डीजल, कीटनाशक और मजदूरी के दाम आसमान छू रहे हैं, लेकिन हमारे गन्ने का भाव वहीं का वहीं अटका है. हालत यह है कि अब गन्ने की खेती में लागत निकालना भी दूभर हो गया है.”

उत्तर प्रदेश के शामली जिले के हाथी करौदा गांव के हरे-भरे गन्ना खेतों के बीच खड़े होकर बुजुर्ग और युवा किसानों ने भारत एक्सप्रेस संवाददाता से बातचीत के दौरान यह बेबाक दर्द साझा किया.

गौरतलब है कि शामली पूर्व में मुजफ्फरनगर जिले की एक प्रमुख और चर्चित तहसील हुआ करता था, जिसे बाद में अलग जिला बनाया गया. गन्ने का कटोरा कहे जाने वाले इस क्षेत्र के किसानों का साफ कहना है कि E20 पेट्रोल के आने के बाद सरकार का यह दावा कि इससे किसानों की आय कई गुना बढ़ गई है, धरातल पर खरा नहीं उतर रहा.

किसानों का कहना है कि जब तक सरकार गन्ने का न्यूनतम समर्थन मूल्य ₹400 प्रति क्विंटल से अधिक तय नहीं करती, तब तक किसान कर्ज के जाल से बाहर नहीं निकल पाएंगे.

क्या है E20 इथेनॉल और यह कैसे बनता है?

E20 ईंधन का सीधा अर्थ है पेट्रोल में 20 प्रतिशत बायो-इथेनॉल और 80 प्रतिशत पारंपरिक गैसोलीन (पेट्रोल) का मिश्रण.

कच्चा माल: इथेनॉल एक वनस्पति-आधारित अल्कोहल (एथिल अल्कोहल) है. इसे मुख्य रूप से गन्ने के रस, शीरे (Molasses), बी-हैवी शीरे, खराब व अतिरिक्त खाद्यान्न जैसे मक्का, टूटे चावल (चावल के दाने) और कृषि अवशेषों के फर्मेंटेशन (किण्वन) और डिस्टिलेशन प्रक्रिया से तैयार किया जाता है.

2G तकनीक (पराली व बायोमास): हाल के वर्षों में ‘सेकंड जनरेशन’ (2G) इथेनॉल तकनीक के तहत पराली, गन्ने की खोई और बांस जैसे कृषि कचरे से भी बायो-ईंधन तैयार किया जा रहा है.

नितिन गडकरी का ‘वेस्ट टू वेल्थ’ मॉडल और दावे

हाल ही में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान पर्यावरण संरक्षण और जैव-ईंधन के विस्तार पर जोर देते हुए कहा था कि देश में अब पराली जलाने की समस्या का स्थायी समाधान निकाला जा रहा है. गडकरी के अनुसार, कृषि अवशेषों और पराली से इथेनॉल, बायो-सीएनजी और सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) तैयार कर ‘वेस्ट टू वेल्थ’ मॉडल पर काम किया जा रहा है, जिससे प्रदूषण घटाने के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है.

किसानों के तर्क: आखिर क्यों नहीं मिल रहा इथेनॉल का सीधा फायदा?

शामली के किसानों ने कैमरे पर उन कारणों को सिलसिलेवार गिनाया जिनके चलते वे खुद को इस पूरी हरित क्रांति से उपेक्षित महसूस कर रहे हैं:

मिलों और डिस्टिलरीज को सीधा मुनाफा: किसानों का कहना है कि पेट्रोल कंपनियों को इथेनॉल बेचने से चीनी मिलों और डिस्टिलरी मालिकों का नकदी प्रवाह (Cash Flow) और मुनाफा कई गुना बढ़ गया, लेकिन इस अतिरिक्त मुनाफे का हिस्सा सीधे गन्ना उत्पादकों की जेब तक नहीं पहुंच रहा.

लागत में भारी उछाल और घटता उत्पादन: पिछले कुछ वर्षों में मौसम के उतार-चढ़ाव, कीटों के प्रकोप (जैसे रेड रॉट) और महंगी कीटनाशक दवाओं के कारण प्रति एकड़ उत्पादन घटा है, जबकि उत्पादन लागत 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ चुकी है.

बकाए भुगतान की पुरानी समस्या: इथेनॉल डिस्टिलरीज चलने के बावजूद पश्चिमी यूपी में कई मिलों द्वारा गन्ने का भुगतान 14 दिनों के कानूनी नियम के तहत नहीं हो पाता.

भाव में यथोचित वृद्धि नहीं: किसानों की मांग है कि जब गन्ने से चीनी, शीरा, बिजली (को-जेनरेशन) और अब महंगे दामों पर बिकने वाला इथेनॉल सब कुछ बन रहा है, तो गन्ने का राज्य परामर्शित मूल्य (SAP) कम से कम ₹400 प्रति क्विंटल से अधिक निर्धारित होना चाहिए.

शामली के किसानों का यह रुख स्पष्ट करता है कि ऊर्जा सुरक्षा और हरित ईंधन के राष्ट्रीय लक्ष्य तभी टिकाऊ बन सकते हैं, जब खेतों में पसीना बहाने वाले अन्नदाता को उसकी उपज का पारदर्शी और न्यायसंगत लाभांश मिले.

यह भी पढ़िए: पेट्रोल में इथेनॉल बना गले की फांस! गन्ने की किल्लत से चीनी उद्योग पर मंडराया खतरा

Bharat Express Desk

Recent Posts