आज राम नवमी है, भगवान श्रीराम का जन्मोत्सव. इस दिन भक्तजन पूजा-अर्चना, व्रत और रामायण पाठ करते हैं. राम नवमी केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि यह आत्मचिंतन और जीवन को दिशा देने वाला पर्व भी है. रामायण के प्रसंगों में जीवन प्रबंधन की कई महत्वपूर्ण बातें छिपी हैं, जो आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं. ऐसा ही एक प्रसंग है रावण और उसकी पत्नी मंदोदरी का, जो हमें यह सिखाता है कि जीवनसाथी की सलाह को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
राम नवमी पर रामायण का पाठ करना पुण्यकारी माना जाता है. हालांकि पूरा रामायण ग्रंथ एक दिन में पढ़ना कठिन होता है, इसलिए इसके सार या चुनिंदा प्रसंगों का अध्ययन किया जा सकता है. रामायण न केवल धार्मिक ग्रंथ है, बल्कि एक जीवन मार्गदर्शिका भी है. अगर हम इसके संदेशों को अपने दैनिक जीवन में उतारें तो कई पारिवारिक और व्यक्तिगत समस्याओं का समाधान संभव है.
रामायण में जब रावण सीता का हरण कर उन्हें लंका ले गया, तब उन्होंने अशोक वाटिका में सीता को बंदी बनाकर रखा. इसके बाद जब हनुमानजी ने सीता को खोज लिया और श्रीराम वानर सेना के साथ लंका पहुंचे, तब मंदोदरी को यह ज्ञात हुआ. वह रावण के अहंकार और युद्ध की संभावना को लेकर चिंतित हो उठी.
मंदोदरी ने रावण को सलाह दी कि राम कोई साधारण मानव नहीं हैं, वे भगवान के अवतार हैं. उनसे शत्रुता ठीक नहीं, इसलिए सीता को लौटा देना ही उचित होगा. लेकिन रावण ने मंदोदरी की इस समझदारी भरी सलाह का मजाक उड़ाया. उसने कहा कि स्त्रियों में साहस, झूठ, चंचलता, छल, डर, मूर्खता, अपवित्रता और निर्दयता जैसे अवगुण होते हैं.
रावण का अहंकार इतना प्रबल था कि उसने अपनी पत्नी की बातों को भी गंभीरता से नहीं लिया. मंदोदरी ने जब देखा कि रावण उसकी बातों का उपहास कर रहा है, तो वह बहुत दुखी हुई. उसने सोचा कि रावण का यही अभिमान उसे ले डूबेगा. और वही हुआ. रावण श्रीराम से युद्ध में मारा गया और उसका पूरा वंश भी नष्ट हो गया.
इस प्रसंग से यह शिक्षा मिलती है कि पति-पत्नी को एक-दूसरे की सलाह का सम्मान करना चाहिए. कभी पति की बात सही हो सकती है, तो कभी पत्नी की. लेकिन किसी की भी सलाह का मजाक उड़ाना पारिवारिक जीवन के लिए हानिकारक हो सकता है. सही सलाह को अपनाने से संबंधों में मजबूती आती है और जीवन में संतुलन बना रहता है.
रामायण सिर्फ एक धार्मिक कथा नहीं, बल्कि यह एक आदर्श जीवन जीने की कला सिखाती है. इसमें नीतियों, संबंधों, मर्यादा और कर्तव्य के अनेक आयामों को दर्शाया गया है. रावण और मंदोदरी का यह प्रसंग इस बात का प्रमाण है कि जब कोई व्यक्ति अपने अहंकार में डूबकर सही सलाह की उपेक्षा करता है, तो उसका विनाश निश्चित हो जाता है.
इसलिए इस राम नवमी पर केवल भगवान श्रीराम की पूजा तक ही न रुकें, बल्कि रामायण की सीखों को अपने जीवन में अपनाएं. इससे न केवल पारिवारिक जीवन सुखमय बनेगा, बल्कि समाज में भी सद्भाव और संतुलन स्थापित होगा.
-भारत एक्सप्रेस
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