Atul Pradhan Accuses Sangeet Som: हरीश शर्मा/मेरठ: पश्चिम उत्तर प्रदेश के मेरठ की सियासत एक बार फिर दो दिग्गजों की जुबानी जंग का अखाड़ा बन गया है. सुर्खियों में रहने वाले बीजेपी के फायरब्रांड नेता संगीत सोम ने शाहरुख खान और बांग्लादेशी क्रिकेटर पर टिप्पणी की तो सपा विधायक अतुल प्रधान भड़क गए. उन्होंने पलटवार करते हुए बेहद तीखा और निजी हमला कर दिया. अतुल प्रधान ने संगीत सोम की ‘हिंदुत्ववादी छवि’ पर सीधी चोट करते हुए सोम और उनकी पत्नी पर मीट की फैक्ट्री चलाने का आरोप लगाया है.
बांग्लादेश से मिली धमकी के बाद संगीत सोम सुर्खियों में थे. इस बीच अतुल प्रधान ने दावा किया है कि दुनिया को नसीहत देने वाले सोम खुद ‘मीट फैक्ट्री’ चलाते हैं. इस आरोप ने मेरठ की राजनीति में नया भूचाल ला दिया है. इतना ही नहीं उन्होंने साफ कहा है कि सोम मुस्लिम साझेदारों के साथ मिलकर मीट का काम करते हैं.
सपा विधायक ने आरोप लगाया कि संगीत सोम और उनकी पत्नी कई ऐसी कंपनियों में डायरेक्टर हैं, जो मीट और मछली की सप्लाई और स्टोरेज का काम करती हैं. उन्होंने कहा कि एक तरफ सोम विभाजनकारी राजनीति करते हैं, तो दूसरी तरफ वे उन्हीं लोगों के साथ व्यापारिक रिश्ते रखते हैं.
अतुल प्रधान ने संगीत सोम की सुरक्षा पर खर्च हो रहे सरकारी पैसे और उन्हें मिलने वाली धमकियों पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि जब भी संगीत सोम की सुरक्षा की समीक्षा या रिन्यूअल का समय आता है, उन्हें कहीं न कहीं से धमकी मिल जाती है. हाल ही में बांग्लादेश से मिली धमकी को भी उन्होंने इसी कड़ी का हिस्सा बताया.
प्रधान ने दावा किया कि सरकार अब तक संगीत सोम की सुरक्षा पर जनता की गाढ़ी कमाई के करीब 66 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है, जो कि संदेह के घेरे में है. मीडिया के सामने कुछ दस्तावेज पेश करते हुए सपा विधायक ने मांग की कि सरकार किसी निष्पक्ष एजेंसी से इस पूरे मामले की जांच कराए. उन्होंने चुनौती देते हुए कहा कि एजेंसियां मेरी और संगीत सोम, दोनों की जांच करें ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके.
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सरधना सीट पर अतुल प्रधान और संगीत सोम के बीच की यह सियासी अदावत नई नहीं है, लेकिन इस बार अतुल प्रधान ने सोम की ‘कथनी और करनी’ में फर्क बताकर उनकी कोर राजनीति पर हमला बोला है. मीट कारोबार में संलिप्तता और सुरक्षा के नाम पर जनता के करोड़ों रुपये खर्च करने जैसे आरोपों ने न केवल संगीत सोम को कटघरे में खड़ा कर दिया है, बल्कि प्रशासनिक एजेंसियों की भूमिका पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं.
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