उत्तर प्रदेश

जीत की गारंटी या पुराना इतिहास? जानिए सीटों के फॉर्मूले पर क्यों आमने-सामने आ गए सपा और कांग्रेस

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में भले ही अभी छह महीने का समय बाकी हो, लेकिन राज्य की सियासत का पारा अभी से चढ़ने लगा है. भारतीय जनता पार्टी (BJP) को घेरने के लिए बने ‘इंडिया’ गठबंधन के भीतर अब सीटों को लेकर खींचतान शुरू हो गई है. सबसे बड़ा पेंच समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर फंसता दिख रहा है.

सूत्रों की मानें तो अखिलेश यादव की सपा, कांग्रेस को 60 से 70 सीटें देने के मूड में है, जबकि कांग्रेस 2017 के चुनाव का हवाला देकर 105 सीटों की मांग पर अड़ी हुई है.

‘जीत का फॉर्मूला’ ही चलेगा

समाजवादी पार्टी की रणनीति इस बार बेहद साफ नजर आ रही है. अखिलेश यादव का संदेश है कि सीटों की संख्या से ज्यादा यह मायने रखता है कि कौन सी पार्टी किस सीट पर चुनाव जीत सकती है. सपा की आंतरिक टीम हर जिले का जातीय समीकरण, संगठन की मजबूती और संभावित प्रत्याशियों की जमीनी पकड़ का आकलन कर रही है.

सपा ने कांग्रेस से भी उसके जिताऊ उम्मीदवारों की सूची मांगी है, ताकि केवल वही सीटें दी जाएं जहां कांग्रेस असल में बीजेपी को टक्कर दे सके.

अमेठी-रायबरेली और शहरी सीटों पर पेच

बातचीत में सबसे दिलचस्प मोड़ गांधी परिवार के गढ़ माने जाने वाले अमेठी और रायबरेली में आ सकता है. 2022 के चुनाव में कांग्रेस इन दोनों जिलों की एक भी सीट नहीं जीत पाई थी, जबकि सपा ने रायबरेली की 4 और अमेठी की 2 सीटों पर कब्जा जमाया था. ऐसे में सपा दोनों जिलों में कांग्रेस को सिर्फ एक-एक सीट देने के पक्ष में है.

इसके अलावा, सपा कांग्रेस को लखनऊ, कानपुर, गाजियाबाद, आगरा, मेरठ और वाराणसी जैसे बड़े शहरों की शहरी और अर्धशहरी सीटें देने पर विचार कर रही है, जहां कांग्रेस का पुराना संगठन थोड़ा सक्रिय है.

2017 का फॉर्मूला बनाम आज का सच

कांग्रेस का मुख्य तर्क है कि 2017 के गठबंधन में उसे 105 सीटें मिली थीं. हालांकि, उस चुनाव में कांग्रेस केवल 7 सीटें ही जीत सकी थी. यही वजह है कि सपा अब पुराना इतिहास दोहराने से बच रही है. सपा का मानना है कि 2017 का सियासी माहौल अलग था और आज जमीन पर सपा ज्यादा मजबूत स्थिति में है.

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-भारत एक्सप्रेस

Vaibhav Gupta

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