आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब सिर्फ कंप्यूटर और तकनीक की दुनिया तक सीमित नहीं है. इसका असर हमारी नौकरी, पढ़ाई, कारोबार, फैसले लेने के तरीके और रोजमर्रा की जिंदगी तक दिखाई देने लगा है. AI तेजी से ऐसे काम भी करने लगी है, जिन्हें कभी सिर्फ इंसानों की क्षमता माना जाता था. यही वजह है कि एक तरफ लोग AI को भविष्य के बड़े अवसर के तौर पर देख रहे हैं, तो दूसरी तरफ यह सवाल भी लगातार उठ रहा है कि अगर मशीनें इतना कुछ कर सकती हैं, तो आने वाले समय में इंसानों की जरूरत कितनी रह जाएगी?
इसी सवाल को केंद्र में रखती है नितिन सेठ की किताब Human Edge in the AI Age: Eight Timeless Mantras for Success, जिसका हिंदी संस्करण AI युग में मानवीय श्रेष्ठता नाम से सामने आया है. किताब का नजरिया डर पैदा करने वाला नहीं, बल्कि यह समझाने वाला है कि AI के बढ़ते प्रभाव के बीच इंसान अपनी सबसे बड़ी ताकत को कैसे बनाए रख सकता है.
नितिन सेठ Incedo Inc. के को-फाउंडर और CEO हैं. इससे पहले वह McKinsey, Fidelity और Flipkart जैसी बड़ी संस्थाओं में नेतृत्व की जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. AI, डिजिटल बदलाव और डेटा के क्षेत्र पर उनकी यह तीसरी किताब है. इससे पहले वह Winning in the Digital Age और Mastering the Data Paradox लिख चुके हैं.
नई किताब में उनका फोकस तकनीक से ज्यादा इंसान पर है. उनका तर्क है कि AI जितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, इंसान के लिए सिर्फ नई-नई तकनीक सीखते रहना पर्याप्त नहीं होगा. असली बढ़त उन क्षमताओं से मिलेगी जिन्हें मशीनें पूरी तरह अपने कब्जे में नहीं ले सकतीं. जैसे सही सवाल पूछना, बेहतर निर्णय लेना, दूसरों को समझना, नेतृत्व करना, जोखिम उठाना और अपने काम का उद्देश्य तलाशना.
किताब एक दिलचस्प विरोधाभास की ओर भी ध्यान दिलाती है. इंसानों से लगातार मशीनों की तरह तेज, कुशल और उत्पादक बनने की उम्मीद की जा रही है, जबकि AI खुद भाषा, रचनात्मकता और दूसरे मानवीय गुणों की नकल करने में बेहतर होती जा रही है. ऐसे में जरूरत इस बात की है कि इंसान अपनी विशिष्ट मानवीय खूबियों को और मजबूत करे.
किताब को मोटे तौर पर दो हिस्सों में समझा जा सकता है. पहले हिस्से में AI के कारण हो रहे बदलाव और उससे जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा है. इसमें नौकरियों का बदलता स्वरूप, रचनात्मकता पर AI का असर, भावनात्मक समझ की अहमियत और जीवन में उद्देश्य खोने का खतरा शामिल है.
दूसरे हिस्से में इसका व्यावहारिक रास्ता बताया गया है, जिसे लेखक ने POSSIBLE फ्रेमवर्क का नाम दिया है. इसके आठ प्रमुख आधार हैं.
इन आठ मंत्रों को केवल कॉरपोरेट दुनिया के नजरिए से नहीं देखा गया है. किताब में भारतीय दर्शन, आधुनिक मनोविज्ञान और लेखक के व्यक्तिगत अनुभवों को भी इन विचारों से जोड़ा गया है. भगवद्गीता से मिलने वाली सीख को आज की जिंदगी और कामकाज की परिस्थितियों में लागू करने पर भी जोर दिया गया है.
यही पहलू किताब को केवल AI या करियर पर लिखी एक और किताब से अलग बनाता है. संदेश सीधा है—तकनीक बदलती रहेगी, लेकिन इंसान के भीतर की स्पष्टता, संवेदनशीलता और उद्देश्य की जरूरत बनी रहेगी.
किताब के एक साल पूरे होने और इसके हिंदी संस्करण के लॉन्च के मौके पर Incedo ने दिल्ली में “AI for भारत: एक खास चर्चा” नाम से कार्यक्रम आयोजित किया. यह आयोजन डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर के नालंदा हॉल में हुआ, जहां नितिन सेठ और अन्य विशेषज्ञों ने इस बात पर चर्चा की कि AI की वैश्विक दौड़ में भारत अपनी अलग पहचान कैसे बना सकता है.
भारत के सामने इस मामले में कई खास फायदे हैं. देश की बड़ी युवा आबादी, भाषाई और सांस्कृतिक विविधता, तेजी से बढ़ता डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और सदियों पुरानी ज्ञान परंपरा इसे एक अलग स्थिति में खड़ा करती है.
किताब का नजरिया यह है कि “AI for Bharat” का मतलब केवल भारत में AI तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाना नहीं है. असली सवाल यह है कि AI का विकास ऐसा कैसे हो जो देश की विविध आबादी के लिए उपयोगी, समावेशी और उद्देश्यपूर्ण हो. हिंदी संस्करण को भी इसी दिशा में एक कदम माना जा सकता है, क्योंकि इससे किताब के विचार अंग्रेजी से आगे बढ़कर देश के बड़े हिंदी भाषी पाठक वर्ग तक पहुंचते हैं.
यह किताब उन युवाओं और छात्रों के लिए खास तौर पर उपयोगी हो सकती है जो बदलते जॉब मार्केट के बीच अपने करियर को लेकर सोच रहे हैं. इसके अलावा AI के दौर में अपनी टीम और संगठन को तैयार कर रहे लीडर्स, नए कारोबार शुरू करने वाले उद्यमी, शिक्षक और नीति निर्माता भी इसमें अपने लिए उपयोगी विचार तलाश सकते हैं.
लेकिन इसका दायरा सिर्फ प्रोफेशनल दुनिया तक नहीं है. AI का इस्तेमाल अब आम लोगों की जिंदगी में भी बढ़ रहा है. ऐसे में यह सवाल हर किसी के सामने है कि सुविधा और तकनीक के बीच इंसानी जुड़ाव, संवेदनशीलता और उद्देश्य को कैसे कायम रखा जाए.
नितिन सेठ की किताब का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि AI के दौर में इंसानों को मशीनों से बेहतर मशीन बनने की जरूरत नहीं है. जरूरत इस बात की है कि वे अपनी उन खूबियों को पहचानें और मजबूत करें जो उन्हें इंसान बनाती हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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