यह अगस्त 1946 की बात है. भारत विभाजन की आंधी तेज हो चुकी थी. मुस्लिम लीग के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान की मांग पर एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे थे. उनका सपना था कि प्रस्तावित पाकिस्तान में कलकत्ता (आज का कोलकाता) भी शामिल हो. अगर यह योजना सफल हो जाती, तो आज कोलकाता बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) का हिस्सा होता.
लेकिन एक व्यक्ति ने इस योजना को धूल में मिला दिया. उसका नाम था गोपालचंद्र मुखर्जी, जिन्हें लोकप्रिय रूप से गोपाल पाठा या गोपाल पाठा मुखोपाध्याय कहा जाता था.
16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग ने Direct Action Dayका आह्वान किया. इसका मकसद था पाकिस्तान की मांग को बलपूर्वक थोपना. बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री हुसैन शहीद सुहरावर्दी की मौन सहमति से कलकत्ता में हिंसा भड़क उठी. मुस्लिम लीग के गुंडों ने हिंदू इलाकों पर हमले शुरू कर दिए. सैकड़ों-हजारों हिंदू मारे गए, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार हुआ और शहर आग की लपटों में घिर गया. इसे Great Calcutta Killings के नाम से जाना जाता है.
जिन्ना और लीग का प्लान साफ था — कलकत्ता में हिंदू बहुलता को तोड़कर डर और हिंसा से शहर को पाकिस्तान की तरफ झुकाना, ताकि बंटवारे के समय पूरा बंगाल या कम से कम कलकत्ता पूर्वी पाकिस्तान में जा सके.
गोपालचंद्र मुखर्जी (जन्म 1913) बौबाजार इलाके के रहने वाले थे. उनके परिवार की मटन की दुकान थी, इसलिए उन्हें पाठा (बकरे का मांस बेचने वाले) कहा जाने लगा. वे पहलवान थे, प्रभावशाली व्यक्तित्व के मालिक और स्थानीय स्तर पर काफी ताकतवर. पहले से ही वे कुछ गैंग लीडर के रूप में जाने जाते थे, लेकिन 1946 में वे हिंदू समाज के रक्षक बनकर उभरे.
17-18 अगस्त से जब हिंसा चरम पर पहुंची, गोपाल पाठा ने युवाओं को संगठित किया. उन्होंने व्यायाम समितियों, स्थानीय हिंदू युवकों और बुर्राबाजार के मारवाड़ी व्यापारियों से मदद ली. हथियार इकट्ठे किए गए — लाठियां, छुरे, रॉड्स और कुछ आग्नेयास्त्र भी.
गोपाल पाठा का आदेश सख्त था:
“एक हत्या का जवाब दस हत्याओं से दो.”
उनकी टीमों ने हिंदू मोहल्लों की रक्षा की, बैरिकेड लगाए और आक्रमणकारियों पर पलटवार किया. दो-तीन दिनों में हिंसा का रुख बदल गया. मुस्लिम लीग के गुंडे, जो बिना रोक-टोक लूट-पाट और हत्याएं कर रहे थे, अब खुद बचाव की स्थिति में आ गए.
हिंसा इतनी भयावह हो गई कि मुस्लिम लीग के बड़े नेता, यहां तक कि मुख्यमंत्री सुहरावर्दी खुद गोपाल पाठा से संपर्क करने लगे. उन्होंने हिंसा रोकने की अपील की.
गोपाल पाठा का जवाब था — पहले अपने लोगों को निहत्था करो और हिंदुओं पर हमले बंद करो, तब बात होगी.
उनकी दृढ़ता के आगे लीग को झुकना पड़ा. 20 अगस्त तक सबसे भयानक हिंसा थम गई. गोपाल पाठा और उनकी टीम ने हजारों हिंदुओं की जान बचाई, महिलाओं और बच्चों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाया और शहर से हिंदुओं के बड़े पैमाने पर पलायन को रोका.
अगर कलकत्ता में हिंदू आबादी का भारी नुकसान होता और शहर मुस्लिम बहुल बन जाता, तो 1947 के बंटवारे में ब्रिटिश और लीग आसानी से कलकत्ता को पूर्वी पाकिस्तान में शामिल कर सकते थे. गोपाल पाठा की सशस्त्र प्रतिरोध ने यह संभावना खत्म कर दी.
नतीजा यह हुआ कि बंटवारे के समय कलकत्ता भारत में रहा और पश्चिम बंगाल बन सका. बाद में 1971 में पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश बना, लेकिन कोलकाता हमेशा भारत का हिस्सा रहा.
गोपाल पाठा ने महात्मा गांधी को भी हथियार सौंपने से इनकार कर दिया था, जब गांधीजी ने शांति के नाम पर हिंदुओं से हथियार जमा करने को कहा. वे कहते थे देश के इस संकट में हम हथियार नहीं छोड़ेंगे.
इतिहास में गोपाल पाठा को कुछ लोग हीरो मानते हैं, तो कुछ उन्हें गुंडा या साम्प्रदायिक हिंसा का प्रतीक बताते हैं. लेकिन तथ्य यह है कि उन्होंने उस वक्त की राज्य-समर्थित हिंसा के खिलाफ संगठित प्रतिरोध खड़ा किया, जिसने कलकत्ता और पश्चिम बंगाल को पाकिस्तान बनने से बचाया.
वे 2005 में इस दुनिया से चले गए, लेकिन उनकी कहानी आज भी बौबाजार के शेर के रूप में जिंदा है. आमार सोनार बांग्ला सीरीज के तहत यह कहानी हमें याद दिलाती है कि विभाजन सिर्फ राजनीतिक फैसले नहीं थे — सड़कों पर खून बहा, लोग लड़े और कुछ अज्ञात नायकों ने इतिहास की दिशा बदल दी. आज जब पश्चिम बंगाल में राजनीतिक उथल-पुथल है, गोपाल पाठा की कहानी हमें सिखाती है कि एकजुटता और साहस के बिना कोई भी शहर या संस्कृति नहीं बच सकती.
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-भारत एक्सप्रेस
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