टॉयलेट मैन ऑफ इंडिया
Dr Bindeshwar Pathak को ‘टॉयलेट मैन ऑफ इंडिया’ के रूप में याद किया जाता है, क्योंकि उन्होंने स्वच्छता को एक छुपी हुई सामाजिक समस्या से निकालकर गरिमा, स्वास्थ्य और समानता के लिए एक सार्वजनिक आंदोलन में बदल दिया था.
सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक के रूप में, डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने स्वच्छ शौचालयों को सीधे तौर पर मानवाधिकारों से जोड़ा, खासकर उन लोगों के लिए जिन्हें जबरन मैला ढोने के काम में धकेला गया था. उनकी जीवन गाथा केवल एक जीवनी भर नहीं है, बल्कि इस बात का एक व्यावहारिक सबक है कि कैसे एक सामाजिक उद्यमी एक ही समय में रोजमर्रा की आदतों और सार्वजनिक प्रणालियों दोनों को बदल सकता है.
बिंदेश्वर पाठक एक भारतीय समाज सुधारक, समाजशास्त्री और ‘सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन’ के संस्थापक थे. यह संगठन कम लागत वाले शौचालयों, सार्वजनिक स्वच्छता और मैला ढोने वालों के पुनर्वास से जुड़ा एक बड़ा आंदोलन है. उनका जन्म बिहार के वैशाली जिले के रामपुर बघेल गांव में हुआ था. बाद में उन्होंने पटना के बीएन कॉलेज से समाजशास्त्र की पढ़ाई की, जिसने जाति, गरिमा और सामाजिक व्यवहार के प्रति उनकी आजीवन रुचि को आकार देने में मदद की.
कई ऐसे सुधारकों के उलट जो केवल जागरूकता तक सीमित रहे, डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने एक ऐसा मॉडल तैयार किया जो तकनीक, जनसेवा और सामाजिक बदलाव को एक साथ लेकर चला. वह अच्छी तरह समझते थे कि स्वच्छता की समस्या कभी भी केवल बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) तक सीमित नहीं होती. इसका सीधा ताल्लुक सामाजिक कलंक, पहुंच, लिंग, जाति, अर्थशास्त्र और इस बात से होता है कि आम इंसान रोजमर्रा की जिंदगी में किसी व्यवस्था को कितना उपयोगी मानता है.
बिहार में बीते उनके शुरुआती दिनों ने उन्हें भारतीय समाज के विरोधाभासों से रू-ब-रू कराया एक तरफ मजबूत पारिवारिक मूल्य, तो दूसरी तरफ गहरी जातिगत पाबंदियां.
सुलभ की आधिकारिक जीवनी के अनुसार, उनकी मां योगमाया देवी ने सेवा की भावना से उन्हें बहुत प्रभावित किया, जबकि उनके पिता रमाकांत पाठक ने शिक्षा को आगे बढ़ने का एक रास्ता माना.
इस परवरिश ने उन्हें एक नैतिक आधार दिया, लेकिन उनके बाद के कामों ने इसे सही दिशा दिखाई. उन्होंने देखा कि सूखे शौचालयों (ड्राई लैट्रिन) की सफाई करने वालों के साथ ‘अछूत’ जैसा बर्ताव क्यों किया जाता है, न कि इसलिए कि उनमें किसी तरह की इंसानियत या योग्यता की कमी थी, बल्कि इसलिए कि समाज ने उनके पेशे से अशुद्धता का ठप्पा जोड़ दिया था. यही अहसास उनके मिशन का केंद्र बन गया: यदि बेहतर टॉयलेट तकनीक के जरिए इस पेशे को ही खत्म कर दिया जाए, तो अपमान के एक बड़े स्रोत को भी चुनौती दी जा सकती है.
डॉ. बिंदेश्वर पाठक की समाजशास्त्र की पढ़ाई यहां बहुत काम आई. ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता केवल गांवों में शौचालय बना देने भर का मामला नहीं था. इसके लिए लोगों की आदतों, मान्यताओं, खर्च करने की क्षमता, पानी के इस्तेमाल, रख-रखाव और उन लोगों के बीच की सामाजिक दूरी को समझना जरूरी था, जो शौचालय इस्तेमाल करते थे और जिन्हें जबरन उन्हें साफ करना पड़ता था.
साल 1968 में, पाठक जी ‘बिहार गांधी शताब्दी समारोह समिति’ से जुड़े, जहां उनका सामना मैला ढोने के काम से जुड़ी जातियों के साथ होने वाले भेदभाव से हुआ.
सुलभ के इतिहास में इस दौर को एक बड़ा मोड़ माना गया है, जिसने उन्हें कम लागत वाली स्वच्छता तकनीक की ओर मोड़ा और लोगों को हाथों से सूखे शौचालय साफ करने के नरक से मुक्ति दिलाने के बड़े लक्ष्य के साथ जोड़ा.
गांधी जी से जुड़ी इस पृष्ठभूमि ने उनके काम को एक स्पष्ट नैतिक दायरा दिया. उनके लिए साफ-सफाई कोई दिखावा नहीं थी. एक स्वच्छ भारत का मतलब साफ-सुथरे घर, सुरक्षित सार्वजनिक स्थान और उन लोगों को सामाजिक सम्मान देना होना चाहिए जिन्हें ऐतिहासिक रूप से अपमानजनक काम करने के लिए मजबूर किया गया था. उनका तरीका सैद्धांतिक से ज्यादा व्यावहारिक था.
अगर सूखे शौचालयों के कारण ही मैला ढोने की प्रथा जीवित थी, तो एक नए शौचालय मॉडल को उस मांग को ही खत्म करना था. यदि गरीब परिवार महंगे सिस्टम का खर्च नहीं उठा सकते थे, तो मॉडल कम लागत वाला होना चाहिए था. इसके अलावा, अगर सार्वजनिक शौचालय इसलिए फेल हो जाते क्योंकि कोई उनकी देखभाल नहीं करता था, तो उस सिस्टम में देखरेख और जवाबदेही दोनों शामिल होनी चाहिए थी.
डॉ. बिंदेश्वर पाठक को ‘टॉयलेट मैन ऑफ इंडिया’ इसलिए कहा गया क्योंकि उन्होंने सस्ते टॉयलेट की तकनीक और सार्वजनिक शौचालय प्रणालियों को लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई, जिससे स्वच्छता और सामाजिक बहिष्कार दोनों समस्याओं का समाधान हुआ.
साल 1970 में उन्होंने सुलभ इंटरनेशनल की स्थापना की, जिसका उद्देश्य घरों के सूखे शौचालयों को दो-पिट वाले पौर-फ्लश टॉयलेट (पानी से बहाने वाले शौचालय) में बदलना था. साल 1973 में बिहार की आराह नगरपालिका में सुलभ टॉयलेट के इस सफर को सार्वजनिक तौर पर पहचान मिली.
यह नाम भले ही सुनने में साधारण लगे, लेकिन यह एक क्रांतिकारी विचार की तरफ इशारा करता है: शौचालय भी सामाजिक सुधार का एक जरिया बन सकते हैं. घर के अंदर या पास बना शौचालय महिलाओं की सुरक्षा, निजता और उनकी गरिमा की रक्षा कर सकता है. एक साफ-सुथरा सार्वजनिक शौचालय बाजारों, बस अड्डों, तीर्थ स्थलों और शहरी इलाकों को सभी के लिए इस्तेमाल के लायक बना सकता है. ऐसा शौचालय जिसे हाथ से साफ न करना पड़े, वह जातिगत अपमान की सदियों पुरानी जंजीर को कमजोर कर सकता है.
पाठक जी के काम ने स्वच्छता को एक नई दृश्यता दी. कई जगहों पर शौचालयों को या तो निजी शर्म की चीज माना जाता था या फिर नगर निगम की अनदेखी का शिकार छोड़ दिया जाता था. उन्होंने इसे आम बातचीत, नीतिगत चर्चाओं और नागरिक योजनाओं का अहम हिस्सा बनाया.
डॉ. बिंदेश्वर पाठक के योगदान को आपस में जुड़ी सुधारों की एक श्रृंखला के रूप में सबसे अच्छे से समझा जा सकता है. उनका हर विचार दूसरे को मजबूती देता था, और यही वजह है कि उनका काम किसी एक अभियान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लंबे समय तक असरदार साबित हुआ.
उनके प्रमुख योगदानों में शामिल हैं:
कम लागत वाले शौचालय का आविष्कार: सुलभ मॉडल ने किफायती और व्यावहारिक स्वच्छता पर ध्यान केंद्रित किया, जिसे घरों और समुदायों दोनों के लिए आसानी से ढाला जा सके.
टू-पिट पौर-फ्लश तकनीक: इस डिजाइन ने हाथ से सफाई करने की मजबूरी को कम किया और सीमित संसाधनों वाली जगहों पर भी टॉयलेट के इस्तेमाल को आसान बनाया.
पे-एंड-यूज (पैसा देकर इस्तेमाल करें) सार्वजनिक शौचालय: पाठक जी ने एक ऐसा मॉडल पेश किया जिसमें सार्वजनिक शौचालयों का रख-रखाव छोटे से यूजर चार्ज से किया जा सकता था, जिससे सुविधाओं के लावारिस होने की पुरानी समस्या हल हो गई.
मैला ढोने वालों का पुनर्वास: उनके काम ने स्वच्छता के बुनियादी ढांचे को कौशल विकास, वैकल्पिक आजीविका और सामाजिक सम्मान से जोड़ा.
जन जागरूकता: उन्होंने देश में स्वच्छता को राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनाया, वो भी तब जब ऐसे अभियान मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बने थे.
स्वच्छता प्रयासों को समर्थन: बाद के दिनों में भारतीय हस्तियों ने भी व्यापक ‘स्वच्छ भारत अभियान’ और एक साफ-सुथरे भारत के सपने में उनके योगदान को सराहा.
इस अनोखे तालमेल ने उन्हें सिर्फ एक आविष्कारक के बजाय एक सफल सामाजिक उद्यमी बना दिया. वह सिर्फ एक टॉयलेट डिजाइन करके नहीं रुके, बल्कि उन्होंने उसके इर्द-गिर्द एक संस्थान, एक फंडिंग मॉडल, एक सर्विस नेटवर्क और सुधार का एक संदेश तैयार किया.
भारत के ग्रामीण इलाकों में स्वच्छता की चुनौतियां अक्सर पानी की उपलब्धता, आय, जमीन, परंपरा और जागरूकता से जुड़ी होती हैं.
पाठक जी की सबसे बड़ी सूझबूझ यह थी कि ग्रामीण स्वच्छता का कोई भी सफल आंदोलन किसी गांव में अचानक कोई तकनीक थोपकर और वहां से हटकर सफल नहीं हो सकता. इसके लिए यह देखना जरूरी था कि परिवार उस डिजाइन पर भरोसा करते हैं या नहीं, उसका रख-रखाव संभव है या नहीं, और क्या इससे कमजोर वर्ग के मजदूरों का बोझ कम होता है या नहीं. उनके इस मॉडल ने महिलाओं की गरिमा के नजरिए से भी स्वच्छता को नए सिरे से परिभाषित किया.
शौचालयों तक पहुंच का सीधा असर महिलाओं की निजता, सुरक्षा, मासिक धर्म के दौरान साफ-सफाई और स्कूल या काम पर उनकी उपस्थिति पर पड़ता है. हालांकि पाठक जी का सबसे ज्यादा नाम शौचालयों और मैला ढोने की प्रथा से जुड़े काम के लिए हुआ, लेकिन उनके काम के दायरे ने पारिवारिक जीवन और सामुदायिक स्वास्थ्य को भी गहराई से छुआ.
उनके विजन में एक साफ-सुथरे भारत का मतलब केवल साफ सड़कें और नालियां नहीं था. इसमें हर व्यक्ति का सुरक्षित शौचालय इस्तेमाल करने का अधिकार और हर सफाई कर्मचारी का इज्जत के साथ जीने का हक शामिल था.
सुलभ के इतने लोकप्रिय होने की एक बड़ी वजह यह थी कि उसने रख-रखाव (मेंटेनेंस) को अपनी सफलता का हिस्सा बनाया. कई सार्वजनिक शौचालय इसलिए खराब नहीं होते कि वे घटिया बने थे, बल्कि इसलिए बंद हो जाते हैं क्योंकि कोई उनकी सफाई, सामान की आपूर्ति, मरम्मत और लोगों के व्यवहार की जिम्मेदारी नहीं लेता.
‘पे-एंड-यूज’ की अवधारणा ने सार्वजनिक सुविधाओं को बंद होने से बचाने का एक स्थायी रास्ता दिया. सामाजिक उद्यमिता का यह एक बहुत बड़ा सबक था. पाठक जी यह अच्छी तरह समझते थे कि संवेदनाओं को जमीन पर उतारने के लिए एक काम करने वाले सिस्टम की जरूरत होती है.
एक अच्छे विचार को बजट, रोजमर्रा के इस्तेमाल, स्टाफ की जरूरत, स्थानीय राजनीति और लोगों की आदतों की कसौटी पर खरा उतरना ही पड़ता है.
विकास के क्षेत्र में काम करने वालों के लिए उनका मॉडल एक बेहतरीन चेकलिस्ट पेश करता है:
दिल्ली में दिल का दौरा पड़ने के बाद 15 अगस्त 2023 को 80 वर्ष की आयु में डॉ. बिंदेश्वर पाठक का निधन हो गया. उस समय श्रद्धांजलि देने वालों ने उनके जाने को भारत के स्वच्छता और समाज सुधार आंदोलन के लिए एक बहुत बड़ी क्षति बताया था.
उनके निधन के बाद से उनसे जुड़ी खबरें अक्सर उनकी विरासत को याद करने पर केंद्रित रही हैं. 2024 में भारत सरकार ने सामाजिक कार्य के क्षेत्र में मरणोपरांत डॉ. बिंदेश्वर पाठक को देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया. इसके बाद 2025 में सुलभ ने नई दिल्ली के सुलभ ग्राम में ‘डॉ. बिंदेश्वर पाठक मेमोरियल सेंटर’ का उद्घाटन करके उनकी 82वीं जयंती मनाई.
इन सम्मानों का बहुत बड़ा महत्व है क्योंकि ये दिखाते हैं कि कैसे स्वच्छता का मुद्दा हाशिए से उठकर राष्ट्रीय सम्मान के केंद्र में आ गया है. जिस विषय से कभी लोग मुंह फेर लेते थे, उस पर काम करने वाला इंसान आज पब्लिक हेल्थ और सामाजिक गरिमा के क्षेत्र में देश का सबसे जाना-पहचाना नाम बन गया है.
आज के दौर में बदलाव लाने वाले युवा यह सीख ले सकते हैं कि किसी भी स्थायी सुधार के लिए सहानुभूति, तकनीक, वित्तपोषण और लोगों के व्यवहार में बदलाव इन सबको एक साथ मिलकर काम करना होगा.
डॉ. बिंदेश्वर पाठक इसलिए सफल हुए क्योंकि उन्होंने सबसे पहले स्वच्छता को एक मानवीय मुद्दा माना और फिर उस मानवीय जरूरत के इर्द-गिर्द व्यावहारिक सिस्टम खड़े किए. उनका जीवन हमें किसी असहज और मुश्किल समस्या को चुनने की ताकत भी सिखाता है.
शौचालय, जातिगत कलंक और मैला ढोने की प्रथा कोई ग्लैमरस विषय नहीं थे. फिर भी, समाज ने जिस तरफ से मुंह फेर रखा था, ठीक वहीं काम करके उन्होंने भारत के सबसे यादगार सामाजिक सुधार आंदोलनों में से एक को खड़ा कर दिया.
इससे मिलने वाला सबक बिल्कुल साफ है: जब कोई सामाजिक असर रोजमर्रा की किसी ऐसी समस्या को हल करता है जिसे लोग असल जिंदगी में आसानी से इस्तेमाल कर सकें, तो उसका प्रभाव और भी मजबूत हो जाता है.
चाहे मुद्दा पानी का हो, कचरे का, आवास का, शिक्षा का या स्वास्थ्य सेवा का पाठक जी का उदाहरण सुधारकों को इन तीन सवालों के जवाब खोजने के लिए प्रेरित करता है:
डॉ. बिंदेश्वर पाठक की कहानी मूल रूप से आत्मसम्मान और गरिमा की कहानी है. शौचालय उनके लिए एक साधन मात्र थे, लेकिन इंसान की स्वतंत्रता उनका सबसे बड़ा उद्देश्य था.
ग्रामीण स्वच्छता, सार्वजनिक स्वास्थ्य और मैला ढोने की प्रथा के खिलाफ लड़ाई को आपस में जोड़कर उन्होंने भारत के साफ-सफाई और सामाजिक न्याय पर बात करने के तरीके को बदल दिया. उनकी विरासत आज भी इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि उन्होंने जिस समस्या को छुआ, वह रोजमर्रा से जुड़ी होने के साथ-साथ बेहद गंभीर भी थी. हर इंसान को स्वच्छता की जरूरत है, लेकिन हर किसी को इसकी समान पहुंच नहीं मिली है.
डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने भारत को यह याद दिलाया कि एक साफ-सुथरे समाज का मतलब सिर्फ झाड़ू लगी सड़कें और बने हुए शौचालय नहीं हैं. यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि समाज के सबसे पिछड़े और कमजोर लोग सिर उठाकर इज्जत के साथ जी पा रहे हैं या नहीं.
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