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कटघरे से इंकलाब; जब अदालतें बनीं अंग्रेजों के खिलाफ जंग का मैदान, पढ़िए आज़ादी की अनकही कहानी

भारत की आजादी की कहानी आंदोलनों, जुलूसों, जेल यात्राओं और शहीदों की कुर्बानियों के जरिए याद की जाती है. लेकिन इस कहानी का एक अहम हिस्सा अदालतों के भीतर भी लिखा गया था. अंग्रेजी हुकूमत के दौर में कई ऐसे मुकदमे चले, जिनमें कटघरे में खड़े भारतीय सिर्फ अपनी कानूनी लड़ाई नहीं लड़ रहे थे, बल्कि अदालत को ही ब्रिटिश शासन के खिलाफ अपनी आवाज उठाने का मंच बना रहे थे.

लेखक आकाश वाजपेयी की किताब फ्रीडम ऑन ट्रायल इसी कम चर्चित पहलू को सामने लाती है. किताब करीब एक सदी के दौरान चले 12 ऐतिहासिक मुकदमों के जरिए बताती है कि भारत का स्वतंत्रता संग्राम अदालतों तक कैसे पहुंचा और वहां कानून, राजनीति तथा राष्ट्रवाद किस तरह एक-दूसरे से जुड़े.

कटघरे में खड़े होकर भी जारी रही लड़ाई

आकाश वाजपेयी सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड हैं और केंद्र सरकार के स्टैंडिंग काउंसल के तौर पर भी काम कर चुके हैं. कानून की उनकी समझ और आधुनिक भारतीय इतिहास में उनकी दिलचस्पी किताब में साफ दिखाई देती है. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की भूमिका और पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी जैसे वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञों की सराहना ने भी पुस्तक को खास महत्व दिया है.

किताब में जिन मामलों को शामिल किया गया है, वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अलग-अलग दौर की तस्वीर पेश करते हैं. 1857 के विद्रोह के बाद मंगल पांडे का कोर्ट मार्शल हो या बाल गंगाधर तिलक पर चला मुकदमा, विनायक दामोदर सावरकर का मामला हो या अलीपुर षड्यंत्र केस में अरविंद घोष की सुनवाई—हर मुकदमा अपने समय की राजनीतिक परिस्थितियों को समझने की एक खिड़की खोलता है.

इसके बाद कहानी काकोरी कांड तक पहुंचती है, जहां राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खान जैसे क्रांतिकारियों ने मुकदमे का सामना किया. लाहौर षड्यंत्र केस में भगत सिंह और उनके साथियों की भूमिका भी किताब का महत्वपूर्ण हिस्सा है. मदन लाल ढींगरा, उधम सिंह, बसंत कुमार बिस्वास और सचिंद्रनाथ सान्याल से जुड़े मामले भी इसमें शामिल हैं.

महात्मा गांधी का 1922 का राजद्रोह मुकदमा और आजाद हिंद फौज के अधिकारियों के खिलाफ लाल किला मुकदमे इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हैं.

अंग्रेजी कानून, लेकिन न्याय कितना?

इन मुकदमों को पढ़ते हुए एक बात बार-बार सामने आती है—अंग्रेजी शासन कानून का इस्तेमाल सिर्फ न्याय देने के लिए नहीं, बल्कि अपने शासन को बचाए रखने के लिए भी करता था. कई मामलों में ऐसे मजिस्ट्रेट और अधिकारी नियुक्त किए गए जिनकी निष्पक्षता पर सवाल उठते थे. कहीं मुकदमे के दौरान नियम बदल दिए गए, तो कहीं आरोपियों के अपील के अधिकार तक सीमित कर दिए गए.

कुछ मामलों में सुनवाई की प्रक्रिया भी ऐसी रखी गई, जिससे अभियुक्तों के पास अपनी बात रखने के मौके कम हो जाएं. गुप्त सुनवाई और कठोर सजा जैसे कदम भी औपनिवेशिक शासन की व्यवस्था का हिस्सा रहे.

लेकिन कहानी का दूसरा पहलू कहीं ज्यादा दिलचस्प है. स्वतंत्रता सेनानियों ने इन्हीं अदालतों का इस्तेमाल अपने विचार लोगों तक पहुंचाने के लिए किया. अदालत में दिया गया बयान कई बार अखबारों और सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बन जाता था. यानी जिस व्यवस्था का मकसद आंदोलनकारियों को दबाना था, वही व्यवस्था उनके विचारों को जनता तक पहुंचाने का माध्यम भी बन गई.

भगत सिंह से लेकर आईएनए तक बदली रणनीति

भगत सिंह का मुकदमा इसका बड़ा उदाहरण है. अदालत उनके लिए सिर्फ कानूनी प्रक्रिया नहीं थी. उनके व्यवहार, बयानों और फैसलों ने मुकदमे को देशभर में चर्चा का विषय बना दिया. इसी तरह गांधी जी के 1922 के मुकदमे में न्यायाधीश का अपेक्षाकृत सम्मानजनक रवैया औपनिवेशिक दौर की न्याय व्यवस्था का एक अलग पहलू दिखाता है.

समय के साथ स्वतंत्रता सेनानियों की कानूनी तैयारी भी बेहतर होती गई. शुरुआती मुकदमों में संगठित कानूनी सहायता सीमित थी, लेकिन आंदोलन के आगे बढ़ने के साथ बड़े वकील और राजनीतिक नेता भी इन मामलों से जुड़ने लगे.

इस बदलाव की सबसे बड़ी मिसाल आजाद हिंद फौज यानी आईएनए के लाल किला मुकदमे माने जा सकते हैं. इस समय तक देश में ऐसे मुकदमों को लेकर व्यापक राजनीतिक और जनसमर्थन तैयार हो चुका था. जवाहरलाल नेहरू समेत कई प्रमुख नेता बचाव की मुहिम से जुड़े. पिछले मुकदमों, खासकर भगत सिंह के मामले से मिले अनुभवों ने भी रणनीति को प्रभावित किया.

इन सुनवाइयों ने देश के अलग-अलग हिस्सों में भावनाओं को झकझोर दिया और आईएनए के सैनिकों के समर्थन में व्यापक माहौल बना.

संविधान से पहले भी आकार ले रही थी न्याय की सोच

फ्रीडम ऑन ट्रायल की सबसे महत्वपूर्ण बात शायद यही है कि यह न्याय और नागरिक अधिकारों की भारतीय यात्रा को सिर्फ 1950 में लागू हुए संविधान से शुरू नहीं मानती. किताब दिखाती है कि स्वतंत्रता से पहले भी भारतीय समाज इन सवालों से जूझ रहा था कि कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए या नहीं, आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार मिलना चाहिए या नहीं और सत्ता के सामने व्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा क्या होनी चाहिए.

ये भी पढ़ें: सोनिया गांधी वोटर लिस्ट केस: 29 अगस्त को आएगा फैसला, जानें क्या है पूरा मामला

-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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